आपुनिक ष््पिः२

आधुनिक्‌ कवि

श्ोसुमिघ्रानद्न पंत

हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग

जि प्रणम सादत निकष्य हिल्धी साहित्य हम्मेशषस प्रपा

प्रवाप निपाद पास्ती म्मे मूदभाय प्रमाम

प्रकाशुषोय

भृहपू्म मोर राय्य प्राचीन कास पे हिन्दी-खाहित्य भौर कियो परसम्मानकरताबारहाहै। ष्यश्मको बषां के वंतिम रेण पवा यत एर बीरसिष्टमी देव ने मसुम्न रखा जीर षंषत्‌ १९९० भिण पे पिष किसी हिन्दी कथि के सम्मानार्थं २००९} का पुरस्कार देना परम्म श्प धा) बत्‌ १९९४ प्रतियोगिता कै ध्िए मये हप रे कोर रषना पूरस्ार योग्य महीं खमक्ती मर यौर एस कारम परस्कार प्रबम्धकर्वी समिति, भी बीरेन्र-केघब-साहिरय-परिपव्‌ ने षप निषि श्चे १००९] हिन्ी साहि सम्भेएन प्रयाग को देष पुरस्कार पषिषेगरी" कै नाम से एक्‌ पुम्तक़-माखा प्राति करने के कषप प्रधान प्प्पा। दान भै क्षयि पम्योखम भीमान्‌ भोरा-नरेष ठा पुरस्कार पमन्पक््बी पमिति का कृतनर है।

एत्कातीमे सम्मेलन की सादित्य-पमिवि ने यह निष्वम छपा चा प्र॑पायसी मे जादुनिक कारके प्रतिनिभि कमि्यो के काम्प-संपरह परफापित कयि जाये। इय माखा षो भिेयहा यह है नि प्रदेक भृमि प्वप॑ भपती कृभितार्मो का चयन भरे मौर स्वम ही सपनी कृमिता का शृष्टि्ोष पाट सामने उपस्पित करे प्रत्येक घप्रहुके सापकनि को इ्वशपि फा तमूना शौर एष प्रतिहधि पचि षा प्केव एवा है।

भ्रसतुठ खंप्‌ एठ माणा का प्रितीय पूप्प है! मापुनिक दार कपयो मभ सूमिमानम्धन पेठ कन एन वितरेष स्यान है। प्रि की पोदमें पके पे कारम उनको कमिवाभा मं उसष धि छोम गध स्पष्ट छाप मिख्वी

~~

ै। हि््दी-घाहिष्य पतरजी कौ हभिताय का अपमा अलय स्मनितत्व है हषा जपती बृठाकेभी बे एकमान प्रतिमिभि हि) एप्रहकेकषि की भपते क्स्य करे परथि प्रको यष विभारभाप को पने के बाद पारदो कौ एषि को छमणि भिपेप घष्टायवा मिकेयी।

ष्य सृस्दर्थ कथि ते साबस्यक दरिदर्तन ओर परिजरदम करके जमनी परिपमय कभिनपपिजा धे परसू कर्मक जभिमष काम्य मसूुय सगृहीप किमे &। परिमर कषिताए्‌ कयि को क्तेमान काम्याय का पूर्व मधिनिभित्न रती ६।

पस दुप्टि षप संस्करव को एपयोभिवा मौर महता पिष सेस्कप्मो कौ मेका मिक परीमषी हो मा्‌ दै! फक्त पत्तणी काम्प-रपिकों क्‌ 'जागुनिक दभि" का यहु सयोनं सस्करल भविक रपयोनीः सिढ दोगा-- देखा हमाण भिस्वा दै।

परयालोचन

यै जपने पत्विपित्‌ साहिध्प-प्याखा को भाखोचक की षष्टि से देने ढै पिय्‌ उतपूक मही पा तु हिन्दी साहित्य घम्भेकन क़ इष्छा मुच मिष षएएी है रि $ परसवुत संप्र अपने बारे स्मयं श्रि संम है # जपे कष्पकी भरमा भो सएपष्ट लौर सप्यकश्पसे पाठके केसापनेन रत पष परर, जो छठ भी प्रका 8 उस पर डक षका मृते माप्रा है उषे मेरे प्टिकोष फो षम मे मदद भिरेगी। पसक मधे मूमिषामे काम्यके बिटय पर, जपने भिचा प्रकट करे के बाद यह्‌ प्रम बसर है षि पने मिका को सीमार्भो के मीरे काम्यके मंतरंग का भियेणनकर ण्ह षंदिप्त पयोजन बो दु मी भटियाौ रह जाम्‌ उनके भिपु मदपय पुज पाठक क्षमा करं

~ एम सौ-पवा सौ पूरप्ठो के सुप्हमे मेरी षमी संपहूनीय कविताएं मबप्य

भक मास है] परजिन पर्मो का मेरी कर्पनाने अनुसरण क्रा है एन पर भ॑षित पह-चिह्ठो का भोड़ा बहुत भामास इसे मिक घष्ता भौर, समभे अयने युग मं प्रभाहि प्रमूक प्रभूतति्यो सौर भिषारपारार्भो दवी मम्पष्ट स्प रेपु भौ इस मिरु जाद मस्तु--

कडित करने कौ प्रेरणा मुपे सदये वहते प्रहृति निरौमण से मिप भिय शेय भेरी अग्ममूमि शू्मशस परेरा भा है) कवि-जीषम से पणे भौ मुपे गाई १, £ पटो एन्व ये बडा प्राहविरवुर्पो को एष्ट शमाक्ताभा भर कों मलाव आकर्यम सेरे मौवर, एथ सम्यक्व शौन्दपकाणास बूनङ्र मरौ चैतनाकोदग्मयकरदेतापा। जवम जोग पूदकर हेरतावा घोष दृप्यपट, शूपषाप भेरी मर्यो के छाम पूमाूए्वाना। मर्ध मोषताषटरमि सितिज समुदूरष्पमौ

~-२-

"एक के ङपर एक उदी ये हप मील भूमि ूरमाधिषठ कौ छामांकित पर्थेय भ्ेपिपं भो वपमे दिद्धरों पर स्थत मुकुट हिमा शो षारन दि कौर वपी उना माकाणएङी जमाकनीङ्िमाको बौर भीडमरचठाप्‌ है क्िसीभी मनूप्यको अपने महान्‌ नीरव मोहन के आष मे दुवा कृ, कु कारू के किए, पुला एकौ है भौर पडू पाय पर्वत प्रात के वातावरण ही काप्रमभिष्ै कि मेरे मीतरभिस्व गौर जकन के प्रति एक पमौर धाष्यर्म छी मावा पर्गतहौ की वष्डु, निर्प ङ्प पे जबस्नित है। प्रति रे धाह ते एक मोर मुपे घौन्दर्य स्क्न मौर कस्यषा- जीमौ षनामा बहूं दूसरी गोर बन-मीद मौलासिपा। बहौ कारनदै मि जनसह से अवीर्य दूर मागता मौर मेरे जालोचर्भो क्रायहक्टणा कुण मधं तक दीकहीहैभिमेरी कर्मता शोगों के सामने बने मे लजसी है

मेया शिजारदै कि बीभाते प्राम्बा छक मेरौ समी रथना्मोमे प्रा रिक सौच्व्य भा प्रेम दिष्ठी ङ्प बठमान है।

छद हुम छी मृदु शापा सोढु प्रष्ति भी माया बते ठरे भाढ बाप मे कैसे उषसा पु लोचन 7--

मारिषौभणाकेचित्रन प्हरिङेप्रति मेरे बगावमोहकेसाकौद। प्रधि

निचै्षण मुपे मपतौ जावनार्यो शरौ जभिम्यंजमा भे जभिक सयवा पिी है, शृद्ौ उससे जिषार्णेषी भी परेरा मिसौ है! प्राङृविक भिष्मा प्रषः धने जपती भागनार्मो का पौन्द् भिका कर छ्‌ एम्िम चित्रन भलापाहै, कमौ दमौ भाकना्गो को ही प्राकृतिक सौन्दर्य का पिभा पहना श्वा है) बधपि “उच्छ्मास" भादू बालः शिष्येषु पषाण"

शौ कभिहयरः पशा डो मित्रः श्वंसामे पीम' जावि बरे र्नाथ मेर दप-भित्के भौ प्यप्वि उषष्रल भिष्दे ह।

प्रहृत षो मैने जपने जलम सजौव सत्ता रमै बाती नारीः स्पभदेषाडैः

फैली हरिपारी में भौन वकी देल री मा बह जपनी बय बाखी म--

पटिमा मेरी इस बारणा कौ पोपक कमी जव ने प्रहत से वादाहम्य काजनुमबक्ष्ाहत्बङे खपमेकोमी नारी स्पे भक क्षिया द। पै पारमिक रथषार्मो मे एस प्रकार के ्िप्नाटिग्म कं अनेक उदाहरण मिमे।

छ्ाषारएपत प्रकृति के पुन्दर क्प ही ने मूके मधिक शुमापादहै पर एका यप्र श्प भौ ने 'परिबतेल' जिजरिते छिपा है) मागेब-स्ममाम भ्म मी कमि भृन्दर ही पक्ष प्रहण प्या है पीते मेख मन बर्तमाते समाम कौ कस्यताभों से कट क्र भागी समाज की कर्मना की भोर पमाभित हिमा ै। पह सत्प है भि प्रकृति षाण स्प मूतेकम सभा है पदिक रप्पमरिय थमा निराराबादो होवा ठो शोद्पयछ एष्य {१ 1००९1 तक्म बाल्लाकटोर ङ्प जीव निदान कारय है मुपे अपनी भोर अभिक लीषदा। बिनु "बलि भदृ, उत्का स्पा की मीपण मूपरण एम फोमर मनुज केवर को मभिप्य अभिक से भपिम्‌ मनुजोजित घापग मिल सक्ेगे मौर बह पपे किए एेसा मानवता प्रसाद निर्माण कर धके भिसम 'मनुप्य जीबन को पन पुक्तिः मपि सुरित षड्‌ स्पेषौ पह मापा मुपे जनाद कप पे पदैव वाक्पिव भरती एौ ६ै--

“मनुम्‌ प्रम से जह डु सक्- मानन ईष्वर | धौर कौन पा स्वगं बार्हिएु वुपते षण पर?

भौमा मौर पस्मब मिरोपतः, भरे पराहृथिम्‌ साहषयं कालको रना छव प्रमि षौ महत्ता पर मुभे बिष्वामया मौर रसक्ष्यापार्णेमं मप्र पूर्णता षा भमाम मिना था! बड मेरी पन्य-हिष्मा को पूति कृषी धी जिसके मिवा उस समय मूसे गोर्बम्नुप्रिय मडीषी। स्वामी पिभेकामम्द मौर रामतीय कैः अध्ययन प्ररति प्रेम क्खापही भरे

=-=

पआङ्ृतिक वर्धन के हान भौर भिश्वास मे भौ भभिबृदि हई। परिजन" मेद भिचारषारका कापी परमाबहै। मब # सोचता कि प्राङ्तिक्‌ दुन जो एक निप््यिठा धी हव ठक स्दिप्युरा प्रदान कए्ता दै, वौर एष प्रकार से प्रि को सूर्बष्टिवमयी मान कर उसके प्रचि भारमसमर्पन धिश्च साताहै बहू एामाजिक्‌ जोगन के ति्‌ स्वाप्स्यकर मही है।

ष्ठ सौ जप भवर उपक्न -एक सौ जपं भिजन बन ! प़ौतोहैगपार ठार सृजन सित संहार) --

सावि माक्वाए्‌ मनुष्य को अपे केखपेश्युद करणे के बाद कर्सी सध््यि सामूहिक प्योगके किए मय्रसर महौ कर्ती बस्कि तसे चीषलषौष्ठन भ॑मूएता का उपवेष पर देकर रह्‌ जाती है इस प्रकार शी बमाणारमणषता (भिगेटिषिरम) के मूष हमारी संस्कृति मे मध्ययुमसे भी गहरे धुरे हुए हः जिसके कारण जवीव ष्टि से हम जपने स्वाभाभिक्‌ जर्म-रतन्‌ के संस्का (संस्क प्रिडमेन्बि रिटक्द्स) को शो बैठे, मौर जपते प्रति भए भत्थाचार्णे को बोषौ दर्पिता का स्प देकर, भूपथाप पहन करना सीव मए ह। साब ही हमा बिष्यास मनुष्य की सगि धरन्ति धेट कर भकष पमूमक्त्‌ दैषौ घि पर अटक पया ई, जिसके एश. स्वङ्प हम वे पर भिपतिकेवुमो मे डी दर सदो षीभे भिरे षप है।

प्लव भौर गुयत कालके बौ्मे पेण दोर भावा छा पौन स्वप्न दृट भमा। पस्छ्व फी (भरिजर्तण' कमिता दूरी ष्टि से भेर मामधिकं परिनर्तन की मौ चोरक दै इसीलिए बह पस्र्न बपना िष्ठेप ध्यम्ित्व रखती ६ै। रर्सनघास्म भौर रपमिपदौ के भप्यमन मे मे रामहत्ब मं म॑पन वैदा कर विया भौर मदे प्रषाह्‌ षौ दिष्रा बदल डो। भौ निजी च्छा संतारे दृष समय तकर राप्य भौर दरा सौनता गर्ई। मनुष्य के जीव जीदन के अनुमर्भो का रिहा बदा ही करन प्रमाधित हुभा। जगम के मनुरङ्पमे मृन्पु पिए हने षमी बरत के कुमुम नाबरथ के मौठर पत्रा कस्विपंजर्‌ |

शलोख्ता हमर जम सोन मठी उषर मृष्पु क्ण सय जही मपुक्तु कौ मुंमित गक सकी बी मौगन के पाए, मङ्िबिनता मै निब तत्का सिहर उख्वी-बीषम है मार। भेराौबदुष्टिकामोह एकपकार से पू रूगा भौर सहज जीबन म्यहीतेकषएे को मानना एक्‌ दद्‌ का षका रगा! एस क्षणभगुरता कै बुदा के ष्याकुरू संसार तं परिबर्तन ही एकमाभ्र सिरतन सत्ता चान पठने मी मेरे हृष्य कौ घमस्त॒भाकांषाए्‌ मौर मुक-म्बप्न सपने भीतर गौर बाहर भिसी महान्‌ पिरत भास्ठमिषता मा मंम अन जनि 1 कहे ठठ भजञात प्रयास दी आकुषता मे ऊरूव कएने 1 सितु दनि का मप्ययन, भिदक्यणकोर्वनी भारप्र जहा जौषमके भाम स्प मुनक छिशके उतारकरमनषकोघ्ूयकी परिषि मटमाता हैष बहषिसकमे कके रस की तर भ्याप्ठ एकः एसी सूषम संस्तेपणा प्म मस्य केओआलोकपेमीहुष्यकोस्पं कता है एि रसकी सर्वाधियत भि को भीकम जानन पे मूर्य भौर पिम्मित कर देती ै। मापएतीप दन नै भेरे मन को जस्पिर षर धिया।

जग बै उर मने बरसो ज्पोतिमय जीभन षरमोपु लपु तूण तपर हे जिर मम्यय निर गृदन !'--

पमौ एिपेप क़ भस्यना बे हारे, भिसने “ग्योत्समाः भौर मुंजमकौ प्मरा' का जग्म दिया है, £ पस्छ्वसे ुंजम्े अपनो पुनरम्‌ धे पष्‌ की भूमि प्र पदाय हए पहा हे! पूगनम मेरी बहिर्मुगी ममि मुर षः परे मर्व स्थापित बर यंरमुतो अनम का प्रयत्न करती £ घाप हौ जन भौर ज्योसस्न प्रं भर श्यना भिदः सूम एषं भागा-

- ६\-

रमक हा णर है! गजम के मापा संगीव एक पषरता मधुरदा बौर कमजणा भा गरं है जो पर्य बही मिख्ती गुञेन के संगीत मे एकत है पस्लन के स्वर्यो मे बहुता प्लव की मापा द्य जमत्‌ केस्म सा की कर्पता ते मांसरस मौर पत्समिद है पूजन करी भावा धति बौर कस्पमा के घौन्यर्य से णुजिव। भ्योतस्ना का बाठाभरण सी सुकू्म कौ कस्पना से ओ्रो है खखका सांसछृविकु समम्बय घबलियतवा (देन्ेनडेन्टलिस्म) के मालक (वर्धन) को भिकीर्णकरदादै।

महं क्डाजाताहैक्तिमेरी कबितामो रे पून्दरम्‌ षौरध्ििषम्‌पेमौ अदे लकय न्यम्‌ का षोष नहीहोता दहै घाव ही रमे बह बनूमूधिकी तीरा वहौ मिती जो सत्प की ममिष्यन्ति के जिद्‌ आवस्यकदै। यद सख है कि ध्यभ्ििमत सुख हसे घन्य को सवभा धपते मातधिक स्य कोने अपनी रथनर्थो भागौ महीदी है मयो मह्‌ मेरे स्वमाबके भिस्द। कने एसे उपर टस्मे कीजेष्टाकी है) पूजनम तपरे मुर मधुरम पै सीम पाया यष तक पुल से बुद्ध को अपाना" जादि मनेक रभगाएु मपी षस बभिकी दोहक है| मुपे लगता है छि ध्पविम पतप स्मयं निषि है। भिस प्रकार पकम क्षप रप, एकमे जौषनोपमोगी षष जोर फूल कौ पर्पिहि टक सत्प के नियमो हौ षरा ही है उषी प्रकार मुदर्म्‌ कौ प्यति धिषम्‌ सत्पहीद्ाणहो घषवी दै! पदि कोरबस्तु उपयोमौ (शिब) है तौ उसके मापाप्मू कार उस एपपौधिता से घबषं' रने भमि पत्य मे मकस्य हीने बाहिर, बहौ वोबहु उपयोगी वीषा सक्प्ता। दती तरह भगुगूति की सीग्रता मौ सापे है बौर मेरौ रनामा मे उसका संबभमेरे म्बमाबसे है सत्पके दोनो श्य ह-- दरी पएएव पवा महस्न्पदै उसे परागं पौना बाहिर, यह भौषत्यहि। एक मका बास्वबिङू (फं्षूयफ) स्प है बूसए परिभाम से संबभ रशने भाजा भरौ स्तां भे षत्पके दूएरे पणके प्रणि मोह मिषताहै बह्‌भेरा म॑स्करार आरमभिकास (समृलिमिसत) कौ मोर जाना) अगुमूति भग सगरव षय बो मर्मुलौ (पक्टरोभरः) स्वमाष भविक करदाः पक्ता है

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मंगर बोय ॑तमुलो स्वमाव (टगर) सरवोमि वूखयकारणस्प रि अमिम्यमत तृ क्र चमक फलस्वरप दत्यागमवी अमुमृनि षो बापौ पेता है मेरे पस्छम षाण की रषनार्म मुं लुकमारमक दुधि से मरानमिषरमधपं गौर हारिका वथिक पिषठती है जौर बाद की रना भत्मोत्र्य भौर मामाजिष् जम्पुदय इच्छा यदि मेय हदय भपनेयुग बरं जने मासे जन्तो प्रति निस्वाम नचोदैव्वातो यरी मागे कौ रषनार्थो मे भी हादिकठा पर्याप्व मान्रामं मियी द्र्तुजगत्‌ के जीमम्‌ से हरय को मोजन मथवा माबना को इष्टप्ति बही मिती तष हदय का मूनापन बुदि के पास सहायता मौगने केलिए पूर नगता है। मते कैसे सूते पस जौगनमेयै सूते पष

शोरेरीदरकौवीणा सकार मधुर जीबनकी"--

मादि उदूमार गुजन माद ह! एेसी भमस्था मे मेख हदय षर्दमान्‌ जौषम केद्रनि पणाया दरि की सामना प्रकट कर सदता घौरमै सवेुावी पानिरपागादी बम एष्हापा। पर मरेस्वमषनेमुप्त रोकाभौरन्नि एषषा निष्पेप्टता सौर पूमेपनके कारणो बुदि मे बुरपानेषा प्रयन्लक्ष्ा। पटौ कारण हैष भेरी माणे षध रणनारए्‌ माढनाः्मभन कर्‌ दविर बगतौ पदं पामरी मागनाष्ामूग प्रषातदान्‌ ष्टो गया ण्योनप्ना चं भेरौ मामा जौर हदि के भये भा मिथि चित्रम मिह्वा है!

मगपकहपका विषठुमर्‌ हूय कोसोपपि्त कणा जोषि एक (ययोर प्रभुति है परी स्वनामा में एषि चितरणोकौ कमौमीण्हौ। प्रादलिर बनूग की पोडना ऋस सोन्लय्रषान मे माबद्थाम भौर माद प्रबभये ह्ममप्रपाम होती जानी है बौदित्ता शादिष्ता ही भ्र धूम

स्प ष्द्‌ हदयी दृपमताङेम जानी) परिवनेनयेमीमेभेयौ बात बदु ६--

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अहौ प्रजाकाम स्वस्य इष्य बाता प्रनय भपाष, लोभो हाजप्य अनूप लोकवा मे पिब भनिकार।

पुजन ते पहे--जव कि मे परिस्मिष्यो के वप्र बपमी प्रमृति को यन मूली बनाने के जिर बाप्य मही हज बा--मेरे जौवन का मस्त मातसिक संबरपे भौर भनुमूति षी दौठा धंजि' भौर भरिवर्व' मे प्रकट दर| जैसार्ि मे पे किलि चुका एव मं प्राति दरपन (वैच्युरेभिरिदक सिकषद्टी) से भवि प्रमाभित बा ओर मान्बजाति के पतिहापिष पष के सत्प से जपरिभितं घा। दरपन मनूप्व के बैपक्टिक संप का इतिहास है षिज्ञान परामूहिक्‌ सरपं का।

रामभ जीर्यत प्रषपि धवन मं निरोप गिषिषित

भिजि प्ररि कोर जनने कौ बिरष सम्यता श्वापित--

ओजे ढी ईस देपिहासिकर प्माश्पा कं अनुसार हम धंसार मँ लोको मानक्ता का निर्मान कएने बधिकरारौ ह|

किर मिस्य मे ङिति --रिसामेभि कर्म बधन मन

दुम्हौ जिरतन बहे वचिरक्तस हीन जिनर्तन | -- जौबन कौ प्राहृतिक भ्यास्या के भनृखार हरमे प्रधि के मियो की पशपत एर्व सर्बसकतिमतता के घम्मुश मस्वक सवाते हरमे पामि मिल प्रषनी है।

गुजने ओर ज्पोस्ना वै भैरी सौन्करवकष्यता ऋमघः भाए्मकस्याप ओर निस्वमेयक ङौ मातनाको जमिम्यकला करने कै क्तिए्‌ इपादामकौ तष्ट पृष्व हुं है। शाप्त नही माब जग को पहु ममी उल्लासः

जा

मनुज को अवसर दे मनुर प्रहति मूल अजभा

श्रुति णाम यहु तूण तूण क्य कुम जह प्रपूल्सिति जीवित यह मका मानब ही रे चिर बिपण्न जीबन-मूठ। --

मारिबादशरी रणनार्बो मेरे हृदय शा जाकर्येम मानममगव शनै आर जषिक्‌ प्रकः होता ६, म्पोस्स्ना तक्‌ भेरे घौन्यरयं जोष की भागना परे एेशिय इवय को प्रमामिव करी रही है ठयक माकनाहीधे जगत फा परि्रव प्राप्त करपरा रहा उसके बादर गदि से मी सखारको मने को चेष्टा करते छा) सपमी भागना फी षय बृष्टि को योषैटेकरेकारम या उसके दब भाने के कारण धने पुर्व मं कदा है --

बह एक असीम भल बिष्व स्पापक्ता छो गर हुम्हारी भिर जीवल षार्यक्वा]

पाषनाकीसमग्रवाकोसोटमोके कारण संड-लंवस्पमे पंसारको भौमन को घम्म का प्रमल्नं करये सगा पह भहा जा स्ता हैक यि मेरी कष्य पाना का द्रूमरा पुम भारम होता है) जीबन पवि एङ मंनिष्वास मेरी बूदि को मलाव स्य से परिजराचति रमे सगा भौर रिपाधरमङके तमो मे प्रकाणस्तम्मभाकामदेने रमा। जैसानि के पुमामे मौ हिता है जीबन शोकोततर अवृती मष्ट्र, बुदि ये दु्वर पार फरो भिदबासर चरण पर| मब मानसा कि भागना मौर्‌ बृदि से परंठेपज भौर भिरठेपय हम एक ही पर्जिाम पर्‌ पटुबते है। पर्मब रा सुजन मेरी मापाप्रं एषप्रकारके बलकारष्ठहै मौर के अमारः मापा संगीत भो परेरमा देने बास तपा माब सौन््यं भा पुष्ट षर बिरट 1 बार फो रथनारभो मं मापा मयि गमित (रेमदरषर) छत जते के करप मेदी बर्कारिवा अमिप्यस्विगनित हो गहै)

-१०-

लयन धौडिमा के कषु मभ मे किस सव मुपमा कासंघार जिरख एनभरुषौ गदे घा बद रा है भपार) कौ भलंकत माषा जिस प्रर स्क्प्नः छा क्य चित्र सामने रहती उसी प्रकार मीव श्ुयबायीः को पुग उपकरणः भव सस्कृति भादि सकनाए मनोरम बिजार चित्र उपम्बिव कषती है। पुष्पयमू' मनाव" शपसग्यः “जीममस्परठ' जादि र्नामो मे भौ भिपयानृकूष भककारिणा का जमा गही ह। मदि यह मेरा सूजन भावे मात्र महौ है तोमुगबानी मौरप्राम्यामं मेरौ कवपला उपनाम की वर्ह ` सूहम जमर संदर्यीबण का" मभूर भितालता्नकर, देप जीर कारके षटोरोको मिलने मे सकषमत षी है, रस हास मौर बिभटम के पूप के स्वह्पप्राप रेखककी सृजत पवौ कर्पला अभिक जीवनके भवीन साती कीश्लोजहौमेष्पपहो जाती है, चसा काकार स्वमागत पौषे पड़ बाता है अवेएष र्ये पिक कका पैपष्य की जाघ्ठा मौ नही रलनी ब्राहिए। युभबालीका “स्प पूजण एमाय मागौख्प का पूजन है| भमीजो जाप्टष भे भस्म है उसके कल्पणात्मक्‌ स्म चित्र को स्वमा मन्त होना बाहिए। मुगमाभौ मे कहा मी है-- अत गए कलाए्मक यावं लग के ङ्प भाम" दुदर पिर त्य कषा के कल्पित माप-मान जत जएु त्वक भग जीवन से हो एक प्राण। लपतकेस्पनाम"पे मेरा अतिप्राय धगौन सामाजिक धंपो प्रे निमित्र भभिप्य मागबधंसारस है! हम $लाको जीबन षी अनुबपिती मानवे टै वब कला का पत पौलहो जन्या है) विकरापके भूग मं जौषत कलाक अनुपामी होला है। मूयवानौमे या बत करत्‌ भक्ती सर्पि क्षि मानौ जीवत ओर माजी मनेकला कलौ पौन्ध्म क्पमा स्वय शौ नपा आमूपयङहै। स्प रू्प जाम्‌ माम स्थर, थिव पौत्र

मनो रा मभिप्य के भस्य सौनयरयका स्पङे पाप मँ षेषते के तिर्‌, -आबाहून कपि पादै

~ ११ ~

प्राभीत प्रचरित बिचार भौर जीणं भारं घमयके प्रबाहुं पनी उपमोगिता के साय अपना सौन्ये मी लो बैठते है उन्हु सजाने की जरूपत पती है। नभीन अदश्ं भौर बिचार घपनौ ही खपमोगिवा कै कारण मंगीठमय एत॑ मक्त होते है। रर्योकि उल्का स्प चित्र भमी सप होता है मौर ठनके रख का स्वाद बील भगुरवा मृदुता सी लुम प्राण त्‌ जिका स्वाह स्प कुछ पनात उमकं किए मी ्रितार्ब होता है! एसी ते उनकी अमिष्पंमना ते अभिक उनका भाबतत्व काम्यगोरब रता है

श्वुम बहून ब्र सष़ो खन मनमे मेरे िषार वानी मेरी पाए दुह स्या बकार

मंभीभेरा यष्टी मभिप्राय है षि ंश्म॑तिमुमकी बागी बिरही ठसक भर्षकार ह| जिन्‌ भिषार्त की उपयागिवा नष्टहो गाः है निनक्ी एषि हमि पृष्टमूमि पसक गर है बे पयराए हुए मूत भिचार मापा को शोसिष बलये है। सीमं बिभार जौर मावनाएे, जो हरय की रम-पिपाया का मिटे उक़ने बातत प्राणियों की वरह्‌ स्वयं हदय ये पर करस्ते हि। भाने भे षम्य को मापा मपने लभीन भरो के प्रामतह्म रममयी ही लषीन जिषे के एय से सासभार मौर जीवम के प्रति नवीम भनुएय कौ दुष्टि से सौन्दरमेमयी होगी] इम प्रकार बाभ्य के मतर िङमित भौर सकिठिष हो जापफ्मे !

छापाबाद एमक्तिण अधिक बद रा कि उमके पाष मजरिप्यक निण उपयोमी नवीन मादो शा प्रद्रा ममी भागना का पौन भोप बौर लवील धिवार्राकारमनर्हीवा। बहुं भाम्य प्ठ्षरकेबल भग्न मवौत नणया पा। रिबेदी युगे माम्य की शुखनार्म छापा षदे एमनिषए्‌ मापुनिद्ध पा पि उमकं समन्दयेमाप मौर षस्पना पाभराहय माहि पर्य्य परमाव पष जुषा पा मौर उमा माव घरीर्‌ पदेन पूष कम्प षौ पर्मणमत मामायिग्वासेपूपष हो ययाथा। बिनु बहु नए पुमकौ सामागिक्ता मौर जिषारपारा षा घमाबयनदीषरमता

~ १२ -

णा! उसम्‌ न्पागसापिक ऋति भौर निकसिषषके भाव का माषा मलयतो षा परमहयुटके बाद गी 'मप्रगस्म' कौ वारणा (भाप्दनिकठा) शौ जाई भी। उतके हस-जम्‌ आघायकाला" लाद मधू पानी" गी जने ने! इसलिए एक जोर बहु निगूढ, राहस्यारमक लाषप्रथाग (द जेनिरव) सौर भैमक्िकेषशो मपा दूपरो जोर केवत टकमीक मौर जामरव माष गमा। दरे धर्म्यो ये लबौम दामाजिक चीषने की मास्तमिक्वा को पदेन केर सकने घे पह हिन्डी कमभिवा छयगकाद ढे शभम ह्वास्युम के वैपमितिक अनुमर्णो उम्भमुखौ भिरार की प्षृततिमो, पेहिक जीवम की आकासमो पूर्वपी स्मप्नों निराष्रार्मो मौर सषेषनार्मौ को भभिभ्यक्त करने लसी जीर व्यक्तिगत चीकत संषपे कौ कलिनाष्मों से धृग्ब होकर, पलामनषिद्मओ प्राहतिक दर्धनकेरिडन्तोकेजाकारपर, पीदरभाहर बखेसूलमे माप्रा निपा जौरसंयोय निबोभकेषन्धौ मे घामंबस्व प्मापित कतै षमी ! सपि कौ पराजय रसम भिरपेष षी भप के क्प मे सौरान्कित होगे गी 1

महयुद के बाप कौ म॑गरेजी कमिता भौ जरिमैवक्तिकता बौरिकया दुता पर्प अभसाद निराला जादिसे भरौहुहै) बहौ उपौहवी दी के कवियों के पाभ बीर सौम्यर्मे के भठानरणसेकृट कर भलगहो गर है। सयु चसष्टौ करणा आर घोष भौ पधिभ्रिपापे प्यक्िमत भसतोप केप्वणय रह कर्ण एषं पामाजिक्‌ जीवन षौ परिस्विपिर्मोपि एप ष्डती ह| बद्‌ बैमनितिक स्वर्यं कौ कटपनाते पेखि होष्धर शामा जिक पूमनिमामि कौ जषा से भनुप्राजिव है) रक्रीहवी ददौ का उत्तम दयते मै मध्यनर्भीय संस्फपि का भरमोप्रव मुम षा है, महयुवषेषाद उखं भिषधन के पिद पकटहोते कमे! छामाबाय भौर मुयो्रकाकीन परय कषिता दोय मिप्भिततिस्यफे षठ पएंकासियूम के स्नायभिक पितोम की परलिप्बनियां ई}

प्छब कत वे उपीषनौ सदौ के अरेगी कषियत्‌--मुस्यप पिष बर्तूषपं कौट्त जीर देनिष्रम--ते मिप स्मे प्रभामिव

~ १६ -

क्रोमि इन कथियो ने मुक्षे मशीनयुम का सौन्देबोष अौर मप्यबर्मीय श्फति का जीबम स्वप्न पिया! रमि बापू ने मीभारत की मारमा शो परिम को मीन पूग की सौम्यं कल्पना ही मे परिपामित किया ४। पूरव मौर परिम फा मेल उनके पमकास्सोगव मीर्हाहै। ष्ठ पफारर्य कशी की प्रपिमा के महरे प्रमाब को मी हृत्ञतापूरवक स्वीकार क्णाष। मौर यपि दिता एक पयतणलम्त तणचतत) पिणं ह, तो मेरे उपचेठन ते इम कमिर्यो की निष्प का य्ह रषयोगमीश््ा है मौर उसे मपते चिकासखष्ामम बनमिकौचेष्टा भौटै। उमर एक भल्ड माबना की ष्यापक्ता कोशो बैठे षी भात

खिडधुषादर। मब मानता टरभिबह्‌ केगल पराम॑ंतयुगकौ सांकृपिक मबनाबौ भिये शेते सोयाया मौर उसके बिनाघके कारण मेरे भीतर नष्टौ मतक षाहर के जमदर्मे ये, इस गाव कफो प्राम्या में निर्षयपूर्वक र्बिषकाह--

शंसो का भदो का भा तियत परामबर

चद भिष्मं सामन्ता णा केवल जडुं चंड्हूर | पूव" के श्वपूण (चापू के प्रतिः) सामं युग के सूम के प्रतीक है राम्या कै रमा ("महामा जौ प्रथि" च) पेतिष्ठासिक स्यू $ पम्मू 'विभिद मर बरेभ्य'हो मप्‌ ह, जो वर्तमान युग कौ पराजय है।

षै मारके हरय तुम्हरे साय माज निप॑पय

चुर्भहोरया मिगत॒ सोम्कतिक हदय यगत शा जर्जर | मादी सासतििक भति को ओर संगेठ करता है

हेम भुषार मौर जागरन करर वैदा हए, दि युम प्रगति भाप्य

होकर, हं मान्ति युगष्ौ जिचारपारा का बाह बनना पद़दै। म्पे भीन मपनष्टी हेते कर प्रगाएके मुपार्‌ मौर जागरण के प्रयो को भू ६। उदाहप्मापे स्वामी दयानन्द जौ मुपारषाहौ ये गिनि

~ १४ ~

मष्वमूग की एकव स्प रीपिपों के म्नो षण बासिर्यो मौर सप्दायौ मेँ बिमकय हिनु बर्मकाखद्धार करने कीचेष्टाकी। शरौ परमर्हतदेव जीर स्वामी भिवकल क्षा यूग साप्तौय दल केलागरनकायुगराै। उन्हनि मनूप्य जापि के कृस्याग के किए कामिक धमन्थय कते दा परयत स्प्वि। शर रवीन्धगाण का पूम दिस्््पापी सस्छियिक समन्म परो देता रा £।

धुभमुग कौ संरकृषियों का चूल धुमणे पार घनान भब संहति का पिकाम्याख करणा श्राह मब धूम

कृषीद्र ङौ प्रधिमाके षमी शाय हेवा है। बह एक स्थान पर जपने बरे ये जिते पी है-- तमस भया ङि मूके एस भिमिभतामे म्याप्ठ एकता कैष्ठरम का पेष देनाहै। शर ठमोर् के जीवमान भारतीम रर्डनिके साक दही मातव पास्त्र (एष्रोपोक्ाजी) निस्मनाय धौर मतर्ट्ीमवा ङे पिडा्ठो से प्रभामिव हृए ह। नके युग का प्रयत्न भिप्र भिच्नदेमो मौर जामि घेफतिमो के मौकिक लाप्माय से माणि जाति केशि निश्वसंस्किकापूल्िमणिकरे कौभोरहाहै। ईला निक जाभिष्कारो से मनुप्य की देस काक भमित भारपार्मो प्रकारठर उपध्विव हो जाने के कारल एषं भवागमत की सुषिषा्थ पे भिप्मिषप् दे्घो जौर नाधि्पो के मनुप्यो मे परस्पर कांप बढ़वानेके कषण रष भग के धिजारर्छो का मामक्जाति के आंतरिक (ताष्कपिक) एकी करण मएने का प्रमत्त स्वामाभिकही गा। महात्माजी मौ दी प्रका, बिर्िष्ठं स्मर्िमादके मानों का पूमजपिरब कए, भिप्-मिद् सार्कृदिक सामाजिक भौर राजनीतिक परि्यिधिपो के बौर संसा पाम॑नस्य स्वापित करना चाहने है) शिज्ु इस प्रकार के एकदैौय पुषवाधौम आओौरजेवर्टीय प्रयत्मभी शषयुगमे वमौ वको घते है अब उको पणित्वा करते बक्ति सिद्वो के गूल बिपीन्र एथिहाधिक सत्य भष

¬ १५ -

पृष्व सम्यता फा होना ना षलसिल मब स्पार, खमस्य का स्वप्न तुम्हा हमा मों ही निष्कल

अनिबाहा युग जीबन के प्रसि मनुष्य के बृष्टिकोण मे ममू परिबर्तन घाना भाता है। बह घामत युग गे सगुन (सांस्कृतिक मत) से मानब भेदना को मूष्ठ फर, मनुष्य ऊँ मौखिक सतकार्णे का यं॑वयुग की बिक्सित परित्विि्यो सौर सूषिभामो के यनुस्प नवीन स्प से मूस्याकम करना मा 1 बह मामब षस्ति फो एर सामूहिक दिकाष प्रवाह मानता है। रप्र मूम कौ जीभ एम्यता मरणासप्न समापन" घे दसी प्रकारकेपुग प्रिर पूना मिरुती है! दूरे कर्यो मे मानं बा मुम मनुष्य समाय का बह्ानिष इग से पुननिर्माण कला बाहवा है! सान को सदेम स्किन मे भास्तविषता प्रदान्‌ की है। मापूगिक यैशानिक जनुषा भी माब भाति कौ ममीन जीयत कस्पना को पृथ्वी पर बहर्त भरने कं इयाय पंडण ह। जिख घंकेपिकार से मानब सम्या पूर गी स्के परिणामक हेतु भापागादी बने रने के किए बिसान्‌ ही हमरे पाण अमोप पि बौर सान एय तिप्मप्यापी के श्म मे जेठ मिजञान मिभ माधि बगो मौर स्वाो मे भिमस्य 'जापिम मागम" (मादि माब कृता अग मी भल प्रं निषा) षग संहार कर रहा है। बह मभिप्य गदीने मानव कै कषिए प्ोषोपयोमी खमाज का मी मिर्माग क्र घकगा1 प्राम्यामे १९४० घन्‌ को संबोधन षे हृए्‌ धने किप है-- भाभोहेदुर्पपं पं लामो जिला के साज गम सूजन जि पताम्बी पा महान्‌ विसान भान रे उत्तर यौमन मम्यघराके तिषा मौरमीक युग बतेहैमोर उन्दी के भनुस्प यनूष्य टौ भाप्यापिमष पारमा मपन भंवर मौर बहिमगठ बे सवप पर्विनिव हर है। भु पुषमे ये गल देषो ढे पूजि पुपि षीष्ट्ेष्ठि बुधि शपि युमको उप्रवि।

धोरामशषौ ध्िविमे कर अनिति परिमि जमित कर गप जह्य को बे सीतापति!

शी शम ईष षष्टि से मपे बेख हप शराधि फे मतक कटे भा प्ते जिने पि जीमेन टी मान स्वां निर्बारिति की! पवि एष सुष्यवस्पिय कपि जीषन की स्यमस्मा पपु-जोभियो की कष्टसाभ्य मस्विरं जीषरजरमौ से श्रेएः बौर सोकोपयोगी प्रमाभिव एक स्वीृद्प षा शदाजारह्ृषि संसरि हीष्ौदेगदै। हृप्य का मुय हृपि जीवम के भिम कामुब षडा है। मारतं जैसे विद्रा एर्बर भौर रम्पप्न मेष णौ खामन्तकालौग घम्यता भौर स्कति जपते रत्कपं के युष रं पंठाप्षो शो शु बे घकती ची --उसका छमस्ठ बैमब बमूस्य उपाषान चकौ अपार मौर्वं भर्म ऋदिसिवि बृष्टि बद्िकरपेने बते स्म्‌ रम-- सतू छौ भिष्तप भागमा बुखि कत्ता प्रेम लात भिति एुस्य

ष्मरत्म---उभेके समस्त पौपिके मानसिक अध्यारिमक तपकरणं को

जद कर, षै ठस युप की अरमोपरति का प्तौक स्वरुप ्रङ्ष्य को

मौवा निमोम को मे हे। ससं परिपूमे स्प जवना प्रतोक साम जुमकौषंकयिष़ाजौर हो भीनही सक्यावा। जौरषपि संपद्य भारत केतिषाकों दूषरादेषा धायर पपेदे मौनी प्क्यागा।

मगा पूर्यौप्तम के प्वश्य मे हपि-जीबन के भाजार-भिषार, रीदिलीति सनष साप्विक नोदीकेषा्ो सदत हपु मारपौय शेप कै बहमूस्य पट गँ नियममूपि श्ण ते घते का पुन्दप्कामकरष्ये ज्र पयसी बेरमूखौ चे अरण कर षिया। कृस्न युग षी भारौ भौ इमारी जिमवे यूप कौ मारौ ६। बह मनसा ष्णा कर्मा जो मेदे मभ म" भाडौ एकनिष्ठ पल्ली गे्ौ शाल प्रयतत करये पर्‌ मौ उका ंपीम्बनि पर मृत्य हो बताह बहु जिहर है, ठल्छमपित सारम भूपदी तिष्ठा के तंप जे के भौर, शीङ मे मिमषनृगङ़ेनर भास के दरार मौ शाति उपस्विवि को है। भौड्प्ने कौ मोपिमां

~ १७ ~

भषयुदपङेयुपद श्रे मोप सस्कृति का मिदात पनती हू पलि कतीह प्रारवीय षति कायो स्वस्य हरमे मध्यमय हेसने को मिषता ११ थो दु रामायण मै मुर्षिव $ \ धुखसी ने कृपि-मन युप मनुशप चि लिपि! रेकी परापीनदाक्नौर हवासकेयुय मसन्कृतिकेि घनस्य डि प्रपलम धूर ए। अन्य रसंस्हतिर्मो हण कर सक्म की उसकी परा्पक्ति मम्द पड़ र, मौर साण्तीय घम्कृति रो रतिपीक जीषमे गग अधिग, संप्रदायो षभों मखो इदि रीति भीदियो ओौर पण्परायन पिरवासो$ेक्यप जमकर द्रोर एषं निर्जीमेहो गया) माभिक मौर रोयनीलिक्‌ परप के कारण जनसापारभ मे दह्‌ क्की भनिष्यता शोषे फा मिस्यापन संसार शी बमारता मापाभाद प्राण्म्पमा, ैराग्य भकना भारि हखगुग दे बनागारमरू पिषार्यो बौर मापो प्रणार बैरा मिह प्रकार इपि भूय ने परुडीगो यूम के मनुप्य को वर्म केता प्रकाएंतर उपस्विलि कर दिम ठसौ प्रर यप्र ष्म आगमन सामि पुष की परिर्थितिरवो मे मामू पिरत लाने की सूषना देता है) वारतपूमभभे भौ समय षमपपर छोटी दी मिदि पुग की पथ सम्बु- निर्पो शा एमम्भय हणा है लवा पामान रयनीधिक सांकगिक भौर पापि शरधिगां इं है हन्तु उत समके तैणिक मार्गो मौर भार्ण को श्यमन्ठुम की परित्तविधिर्यो हौ ने प्रभागितत म्पा दहै! मिष्य मंप परषार्े पवी मरो ये सं्वव रपे बाति पौरिकः धिति गौर्मम पमण माजिक एमं सामाभिक पर्पिस्यितियं निर्पारिव करी मख पुषकेषयन को हम पएव्रहासिष भौविक्णा- दहते हैजो ष्पी चै मदी ढे दमे पौतिश्वादमे पूष ट) षी मोतिष्गा देन भौर नियाति दा मानम य॒भ्बताफे भराय विरसा पतिहामिष { धषम्बय है शरोगयुयदकाजत मल विताबो गा संप भव हदमि-हिशान्‌ घ्रप करवा पथ्य निरयन भरद्‌

~ १८ -

बहु मनुष्य कं सामाजिक जीबन भि डेः प्रपि पएतिष्सिर बुष्टिकोम दै। सामाजिक यणि के दर्धेन के घा हौ बहु उर हामूहिक्‌ बास्तगिक्तामे परित कमे सोम्य शवीन (स्टेट) का भौ भिषायर है 1

भभिकसिते चौ भधङ्े जव अव जौभनोपाय के सापत मुय भशके धासन बते कर गते म्यक समापन सामाजिक सम्बल जगे लव अर्थमिति पर मुप शेय निकार, नेवं रौति तीति नष निमम भाष भे इदैन 1

पविष्ास विजान फे जगुषार जैसे जैस भोवनोपाम के सजत स्वरप हनि मारो थौरपं्भो का जिकर हुमा है मनुप्य जाति के रुने-सहण मौर घामा- मिक निषधान्‌ मे भो मुयावर हुमा है! भवीम जाजिक श्यभस्नाके भाषार पर शीत राजभौतिक प्रमाक्षियं मौर सामाजिक सम्बन्ध स्भापिव हुए मौर एन्हौ के पयिक्ष्प रीति तीलिरबो भिचार्यो एमं कषम्यता का परवुमौमि एमा है। सष ही उत्पासल के मीन पभो पर जि वर्ग विरेप ष्टा भपि कारणा दै, ङे हाप बनप्ापारणके प्नोपतर का हैभिपार भी लमा है, बौर रपौ ने बग समाज पर अपनौ पुभिषागूपारपमगीतिक गौर षास पिक प्रभुत्वे मी स्मापित या है 1 पैणीवादी भूमने दारको जो पपिभिष हान पिदा कता पंरनो दा अवूभूत कौसख' शपा है उपके जगु सम्या नौर मालक्ता का प्रविमनि होने का मुद्य कारण पूजीवादौ परा ही है, जिसकी एेतिहायिक स्पयोपिठा बभेनष्टहोपईहै। जाय जवे किख्षार भरं टिषास का सके ज़ यृडहो षाद, नौर जिसके घाद पूथीषापौ श्ाभ्रास्यषाद का--जितष्ा हिम स्म फधिरम है- वाय भेतभ्यीष्े जाय दतं प्रणा ङे निरोप का चिवेषन करणा पिष्टधेपप के समान ¶। मनू्य स्वमा भौ मीया, एक जोर, अर्व संवर्व एषे रममीनिक रोके स्य भं भात जाहि का रक्तपाद कर उप्रप्रयोगकरर्ही दूती खोर मनूय्य कौ शिक्छपिय पर्ति घमयानुष््छ उपदुषन वर्धन सादित णन भिभारों दय प्रडारकर, सील माधेमना दा बाताभप्य वैदाङरमेके जिए,

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सीमार्जो के मौतर ष्यभ्ति क़ विकास जिख स्पेस पूर्णता चक पहं सका अमा ठस यूज के सामृहिक जिकास की पूर्मता ्यक्ठि कौ जेतनारमे गिन निष्ट गृर्णौ मे प्रषिरखिव हई शाम काक के इम मे म्यक्ति के स्वक्प को उसी वण निर्णत फिया है त्र युम के एामूहिक भिकषि की पूर्णता ख्ख पारथा मे मौकिकि (मकार छा) परिबर्तन उपस्मित कर सकेगी

प्रति मौर षियेकं ङौ तए मनुष्य स्वमाजफ भरेम मौका मिष्वयामक (पाञिरिष) बारना शही नाई जा खक्वी। भनुप्य एक जिभेकी पद्यु है कहना पर्प नहौ है मवुप्य की परासहतिक चना उषे मौमू स्कारो के संब॑ण मे भस्तु-बपत्‌ की परिस्बिधिर्यो से प्रमा- भिव होपौ है बे परिम्बितिमां एेलिष्टासिक गिधा भिकसितव होवी ती है। मनुष्य के मौहिक पंस्कार्ो का देष्पकाष् को परस्जितिर्मो के भगुार शोमा निर्बरिठ हौ जावा है, मथवा उकं उपवापकेक्तिएजोप्रामाथिक प्रभाश्िमां बेभ जाती ह, उमका बहौ प्पाबहारिक श्प धंलछृधि चे समर है।

हम भते गकतिबूपके षप स्थुः को (मुरा विकसित एठि- हापिक परिस्पिचिर्या के प्रतौक षो) दसकतिए्‌ पूषष्म' (भाषी सास्कृतिक मारणो का प्रतीक) मान्ति है छि हमारे भिगत सरंस्ुधिक प्ुप्म कौ पृष्ठ भूमि जिषधितत ब्म के ता्वोने बनी वीर हम जिस स्वषठको कल का पिभ यूुन्यर सत्प" मानते है भह स्पृ पतीक है घामूहिक भिक षादका)

स्मृ भूग का पिर पून्शर पस्य स्वम हौ सूक्म जाम जनःप्रान | र्म मग भं विस प्रकार समाजिकः एहुम-सह्स जीर पिष्टाचारका हत्य राजा से प्रजा कौ मोर प्रषाहित हुवा है उसी प्र्टार नैतिक घदाभार ओर जप शत जुमकेस्तुज कौ रिसा प्रे भिसि भ्यभ्गि से जन-पाषारण कौ भोर। जाजकेप्यरिनि की परयति सामूहिष मिकाधाद ष्टी रिषो कोली अाहिपए हि साद यूम के जिए उप्वौयी. तिकमिव भ्यक्िदाद कौषपाश्ो! "तक ममे प्यक युव अनसमूह पुज मष भिकसिव' --

~ २१ -

घाव युम षा मपि शष्टिकाण ठस युग की परित्पिियो के कारण पषोक्त दस्य भर्गकेगूण (कबाडिटी) घे प्रमानित पा। माने बामा युय साम युमक्ी मैविषवाके पादा से मनुष्य को बहुत हुछ भर्णो मूक्त कर सक्ेगा। बौर उखमा पु" (मौषिकि षंस्कारां हेगषौ घामतकाशटीन नैतिक मान } बिकसित बस्तु-परिस्पिति्मो के फएल- प्वह्य माप्यारिमक दष्टिकोण के परिवर्तम से बहुत दरु मो मे देषः (छ॑तकविक्‌ मार्भो का प्रतीक) बन सगा भष्टौ रे जीबनोपाप ठब निक्षित जौबन यापन कर सके जन इज््ति।

श्व भोरपलु पार्षो मजो सीमित युग युम मे होपे परिबर्हित मवसिव1 भागौ सामाजिके साभार मनुप्य के मौलिक संस्कारो के पिए मधि िषसिद् छामाभिक पेष प्पापित कर सकेगा भति मानबौप भा निरय विकसित प्यक्तिषाद मनर्जो मं जिसने मरा देव पगु षा प्रमाद" ओौर मान स्ममाब ही बन मानम माद गुकर करता पूर्ण षो पूर्ण ममुदर को सुदण्-- भादि भिभार मनुष्य के हिक मंम्वारो के प्रति षमी प्रकारके माप्या ल्म पूष्टिषोग परिवर्त कौ मार मरत करते मधुप्य धुषा काम कौ प्रगृत्तिरयो से प्ररि होकर सामाजिक भ॑गयन शौ मो सौप्यएमर्ण के भय मे माघ्वान्मिक्‌ मल्यक्ो पायक मार अध्रमर हुमा मौनिकदरानवषायद्‌ दाभार्टदशोामषए्ताहैरि एषुष्यी सामाजिकः ष्यषस्पा जिमम रि मधिकापिभ यनुप्या षौ धुषाम श्र पलितूष्ति निर पर्यष्वि सापन पिर सष्वे मौर

- २२-

कतमा मूग कौ संरभदीनवा ठे मुक्द हो कते है, ठन गपने चास्ति एषं माप्यात्मिक निकास के णिए भौ मभिक सवकाप वौर सुनि मित समी एक ओर समाजवादी विभान उत्पाद म्भो की धामाभिक उपयोगिता बाकर, मनुप्य को बरद॑मान मानिक समर्थ से मुक्त सक्गा दूरौ ओर षह उसे खामएवादौ सोस्कतिक मामो कौ सकर्थता मुक्ति बै सकेगा जिने पे सिङ्धपिक उपयोनिता जब सही रह गर्द है बौर जिनकौ जारणाएे जामूत भिकसित एवं परिबत्तितं हो £। यवि मामी वमाण भनुप्य की रोटी (जल आभस्यकपामो का प्रतीक) कौ चिन्ता से मूक कर सका तो उदके हिम कवल सास्कतिक संभरपं का प्रष्न ही तेप रह बायमा। परत्यक भमे बौर सस्कृति मे जपने रेषठकाक से घंव॑व रशने जाने पाक्षेप सत्य को निरये (पूरणे) सत्प का स्प देकर, मनुष्य के (स्मर्ग मरक सं्बपी) मुल मौप्भयकेषंस्कर्णे पे लाम उलयकर, उसकी चेतना मे बा्मिष ौर सामाजि भिषान स्थापित किप्‌ हैमो रि पाम युम कौ परिस्बिधिर्यो को सामे ञे हुए, म्पाषहाणकि दृष्टि ठि उचितौ षा। एस प्रष्रार परत्यक सुग पु्प राम ह्ण बुय जारि, जो कि भप युग के खाप प्रतीके

जना बाण धाष्यत पुच्य (निपेस) की ठह माने भौप्पूमै गर है। घछामितकाफीम उदार्तनामक ङे क्य मे मारे ाहिरय के छत्व धिम पूषणम्‌ के एस्वेव माण भी करेय खखयुग के षएगणसे संव रने बाषौ सपे रला मत्र ह। जषा किप पके मौ षृ भृषाहट मनुप्यके मौलिक पकार सूुषा-काम धाति निरपेलत को षा्कविक मृप्य मही रतै

सभ्यता केमूरमो की भिभिष परिस्वयं के अनर्पं उनका जो भ्वाबहारिकि

सामाभिक ओौर नैधिर मूस्य निदिष्ट हनो जाताहै षा प्रमाब मनुष्य धत्म पिष दुल्दरकी मादनार्बो मी पड्ठाहै। मनूप्य डी प्राभि परृत्तियो मौर सामाजिक पण्णा के बीष्म जिदना भिद सामं

खस्य समापित किमा सकेगा उसौकं मनुस्प अन-खमाज कौ षास्कृतिक भेटनाद्ाभी जिकास सकेगा। जिस सामाजिक ष्यवस्थामे घामाभिक सहाजार जीर प्यक्वि कौ जावप्यक्तायों गौ सीमापे एर दृतरेयं लौनदहो

~ २१ -

जगी, समाय मेँ ्यक्ति मौर समाज के वीषा चिरोष भिर जायगा म्यति के शु देह्‌ सान कौ (अहमारिमषा) माषमा विक्षि हो नाएुगी रषे मौतर घामाजिक म्यश्वित्म स्मत कायें करो सथेगा मौर इम प्रार्‌ प्यश्नि मपने सामूहिक भिका की माध्यात्मिष पूर्णता छक पदुम जाएगा घाम॑व मुग के स्पी-ष्य ंबंषी सदाचार का दुध्टिकोज अब त्यन्त

ममित गहा है। उमा नैधिक मानदं स्मौ की घरतीर यष्टिष्डाै। एम पराचार के एक मेष षठोर को हमारी मप्यपुम की सषी बौर हमारी बासभिषमा मपती छाती से जिपकाप्‌ हर है मौर््रसरे ्ठोर को उप युग एन मेष्या) एमी स्वातष्यमहति' के मनुमार युय के मापिक किनं मभौ स्त्रीक किए को स्पाम सही मौर बहु पुरस्य की घम्पसि समसी जाती फौ दै। स्वरी-स्यातंय सम॑ हमारी माबना का भिकास अर्तमान यूय फी मारधिक परिस्बिधियो के षाय दीहाणाहै। ्िर्मोषा निर्जात मपिक्ार पंषंपौ मांदोष्टन र्वा संस्कृति एवं पूजीगादी युग आसिक परिस्मिति्यो का परिणाम 1 घमं मुग ़ी नारौ नर कीष्टापा मभ णौ है।

्वदाचार श्यी सीमा उसमे नसे टै निर्पस्ति

पूहपोनि बहु मूस्य पर परम केव उसा मरित

बह समाज कौ ना इका यन्य मान सनित

उसका जजन मान मान पर नर फ़ है मवम॑बित।

पोमि मदी है रे मारी बहु मी माली प्रदिष्य्नि।

उमे पृषं श्वापौन करो बहू र्ठैननरपर अयित) हमे यह मही मृहना चाहिए हि समार भभौ साम मुम कौ सुपनैतिष् भौर माणिक मागनारमो ही युदकरष्डाष पूष्वी परममी य॑ यग्‌ प्रनिम्टिव मदी धि सत है1 माने बास युग मनुष्य कौ भूया भाम्‌ शी ्षृतर्पो बिहमिल शामाजिर्‌ सामंजस्य स्पागित भर हमार सगापारणं

पष्टशमेण एवं सन्ये सिं सुरम्‌ कौ पारयार्मो परणारां चप्यं षर भष्पा।

- २४

एविहापिक मौतिकनाद बौर मारपीय अध्यार्म दर्ये मृते की भरष्ारकाजिरोष सदी जातं पडा क्योकि मेमे दोर्षोषो शोरोतर स्पा करारी खास्कथिक पम ही ग्रहन किया है। मागर्वाड के जन्दर भमजीनिर्यो कै छमूष्न भयं परषपं मापि से षंगप रश्ने भते बाद्य ष्य को जिषका लास्तमिष निर्जय माभिक भौर राजनीतिक कोवियां हौ कए सक्सी मैने पती कस्पना का भप मही अनने दिम है। धस दृष्टि से माचा एमं घर्ममूतदितव की जिगनी विद्य भागना मुपे बेदांवसे मिषटी सतनी ही एचिहाधिक बेन भी। भारतीय दार्पनिक ह्‌ घप्यकी चोज मे, स्पेस के रख पाट, वाङ्‌ मनस लो्रम्‌' की भोर शफे मयं है बह पाष्ात्य जापर्निको ने खपे के अन्तस्व तक्‌ बूगकी कनाकर्‌, शसके मापोकरमे भगप्तमामे कै पर्किषठिक जिकास के उपमूक्य राजनीतिक भिषाणदेनेका पौ प्रमणं क्ष्या है। पर्विमते बैषानिक संपर्पं मिक रठ्मोके कारण लवीतठम समाजवादी भिवाग का भिकासमीषाीहोसकाषै।

परपयह जैस निम्न मत कै मनोर्वआनिक दढ, के विष्पेपष मे प्रपि फैस्तरसे भौचै जामे का मेद्य नही देते है। बह गिस्बेतम (बगका्धप) पर, निषेका निर्वन होतकेकारम गे श्राति वैरा होने का पम बततते भारतौप तत्वाष्टा घापद अपने पूष्म नादी मगौभिजञात (गोप) के कारण सपिक के एस भार तफम्ता-ूरभेक पटच कर तकतरस्य सूर्बस्य तत्धर्षस्पास्य बाह्यतः पतप को प्रविष्ट कर स्के ह|

मे जप्पाप्म भीर नौतिक शेषो शरन सिद्धान्तो घे प्रमाभिव हना ्ै। पर भाग्वीप वरन शी सामदकारीम्‌ परिस्मिद्ि्यो के कारण जो एकत परिस भ्यक्ति कौ जीकत-मुभ्थि मे हुई है (दृप्य बनव एमं एकः जौभनके माया होने के करभे उसके प्रथि भिरा भादि की माषना जिके उपमा माव ट) मौर माके धसन्‌ पुयीगादौ परिक्वितिमोके कार्ण जो धर्थयुड भौर रकनेभांति परि &-पे दोनो परिलाम गुते धापा तिक दृष्टि उमोपी नही जन पडे

शर्या पर्मन दम एए परजाम षर पटहे कि यह पिष

- २५ -

अमत ही त्य नही, इवते परे जो निरेक घत्प है बह मन मौरबुदिषि मवौत ै। भिन्तु इस सापेक्ष णवत का-- जिसका सम्बन्भ माधव जातिं एकृतियो- आजार बिजार, रीति नीति भौर सामाभिक सम्बन्धो से भिस किख प्रकार हुता धस पर पेटिषासिक रर्घम ही प्रका शता है। हमारे सासृक्‌ हृदम के शस्यं पिम सुदरम्‌/ का बोम सपे हन्य इस सूष्म से परे ६-- यह्‌ सभ्यारम दरपन कौ पिभारपारा का परिणाम है। सीढन एकि गतिथीर (डाष्नेमिक) है साम॑तकालीन भूम से अबगा भिगत घ्यंस्कृतिष मानो शौर मादो से मातेव समाक संशाह्न मबिप्य म॑ ली हो सकता उसे लषीन जीबन मार्नो की माप्य षाह जिसके एपिहाधिक कारण है मादि - पह भापुनिष भीतिक दयान कौ भिषाएणारा का परिणाम है) एष जीवम के सत्य को ठरप्व॑तल प्र हैम £ पूरा समतल पर

समन्वय के सत्य को मानते हुए मी मै जो मस्वु दरथन (मषभेषिरिम) च्व) धिदांों पर इता जोरदे रहा एका गही कारन पि परिक्तन काल माष दर्गल (सवयेक्रिव सिमो) कीजो कि भम्पूरय बौर भामरण युग को चीज ै--उपयागिता प्राम नष्ट होती दै) एषतो पा किह मपने रे के युगप्यापौ जग्मषटारमे फैते दष मप्यषासीम सस्कृति के उ्वमूर मप्वत्प भा बढ़ मौर पशा सदिति देलार्‌ कर्‌ देना होया मोर उस सांसदतिष मेहता के बिकायके कि देस्यापौ प्रयत्न मौर बिचार सपराम करना पेमा जिषे मूख हमारे पुष प्रय्रिपीस बस्तुस्पिविरयो म॑ हो| भारवीयदर्भनषोष्ष्टिमेभी मूप्रजपनेरेपभौ संस्कृति मूल उस्र ददानम भही मिषूतै, जिसका चरम रिषाम मपरेनबादम हा ै। यह पथ्यष्णीम आव्ारासना पताभ्पों के अन्पविषवामा ददिपो प्रयामो गौर मदमा शो पापाद्रागाो मपुजीभूद भौर आण्टपर होर एव हमारे जातीय जीन मबु मो जट भर, एमी बृदि राके हुए्‌ है! इग जातीय रकल बो एोपण बणे बाघी प्यामि ये मुरय ह्‌ भिना भौर नीम धास्तमिकना माषागो गौर मिदर

~ २६९ -

को प्रन किए निना हम में बह मागवौय एकता जावौप संगठन घश्िव जैदभ्य सामूहिक उशतरशायित्व परो मौर पेदिकू भिपचतिपो का निर्जीव साहस के घाम सामना करने कौ सक्ति गौर शमता धी भा घकयौ, जिषकी मि हमारे घामाभिक्‌ ओौर घास्कणिक्‌ जौवन महामालतवाभरनेके षप एय बडी जानस्यकता है युम के सूजन एषं गिमणि काके संपति के मूष सदैव परिस्मिरियो की बास्तभिक्ताहीर्मे होते है भह जभोमूल भ्व भिता समय के साय घाम भिकास एव स्क्पं कक ऊर्प्वमूल (माक स्प) सरस्सिके चेला भन बाती वै। माज कि पिच्ेपुर्योकी आस्यानिकता मामृष परिहितं भौर भिकषितिष्टोणे भा खी दै, हमारी संसहृरिषफो मील कर्म प्रहनक्रे के प्रपासर्गे फिर से बपोमूहोना वी पहेपा। हम एताभ्पपो से एक हौ मूष सत्प को नित्य नषीन द्म (टर अशं) देते आद्‌ है भभ उस पामे पुल को गबौन भस्यु-पप्पिनिधिरगो अनुप क्षांतरित होते फी मौषिक़ क्षमता घमप्व हो गर्दै, स्मोकि भिगपपूर्ो की वास्तविकता आज तकमात्रर्बो परं बटबढु रही भौ मष महु प्रकार बदलरहीहै।

मरदुष्य का निकास समाज दिष्ठाको होता है समाय का इतिहा

कौ दिया कोषस एतिहासिक प्रमति $ सिद्धान्तो हम दविहासशी अँलानिक्‌ ष्पास्या कहते ¶।

जरम अर्त पक षायूय यूय ते निचि निष्मान जनये उपे प्रसिष््यि करणे दिया म्य मे मस्तु भिबात।

`मौविके पन 'यारममह स्मूतेपुः के प्रव को सामाजिक भारतरभिकता भं परिव करने पोौम्प समाजनादौ भिधान षा भन्मभ्ाता है। पाप्मौम शर्ध केम्ृठवादके पप्य को देषकाङ्र पीवर (सरि $ श्प) मणि- पटिति कर्ने कके सोम्य चिषान को भग्म देना सामवे पम की परिभ्पिधिर्योके बह्टणा! उमके जर्‌ एक्‌ थोर मौरिक्‌ षिञानके भिय हात पौपिष सनिनिपो पर भापिपत्प प्रष्ठकणे कौ जरूरत पौ बसै गोद मनुप्य कौ

~= २५ ~

हामि वेना के भिकासदो) जीढम को जिस पूर्णता के जादर्ण को भनुप्य माओ तष अन्दर जम मे समापित हुए पा भग रसे एक चषोपर्ण वके दपं षटुमहिर्गदेरम भी स्यापित कसला नाहला) शस्य बौर भनौदिकता के प्रति अड उसकी चारणा अपिक बौवि भौरदाप्तमिकहा री ह] सले बाला युग साप युग ङे स्मर्य कीमत मणो कत्पना बौर स्वप्नो को सामाथिष बास्ठदिकताष्टा ख्य दे सषेमा। भनुप्य का पूुजम-दाकति का ईष्वर सोक-श्स्यागके ष्दमर चिषपित हो जामा श््पम मम्नु बम जाय मध्यं मेक स्वं मानी ही भौतिक मब षर्हर पग ही बदि्येपत दल भवे बीमा पाणि ९) भौषिक षगत्‌ धरासम्मर कठोर परिस्पिधि्ो से कुट्ति आधरिम मानम" की दमि मारमा नभीन्‌ पर्ति दे प्रकाणमे दूब कर भमोध्ति हो जाएगी बौर पंत्-यूय ढे घाव पाय साब सम्यत मे स्मर्शपुम पदार्पन क्र मका! दुर सामाजिभका मे मनुष्य आवि "महिमा को भौ प्याबहारिष्‌ स्य मे परिणत ब्र सभेवी। भनुप्य्य का एत्व सिकाठा निद हमत गाषोबाद मामुहति जोम हिमास्‌ को साम्य पमन है समिदाद--

सर्वमान दिष्षपापौ युद्ध मे युम उपर्ुकलः भिदेषना दः शिएु धाद ही शोभने एषे हु

यदि स्व्णेद्म षौ जाता माज कौ मवूप्ल जपापता षौ भासति परनि मौर पलायन प्रष्ति स्वप्न पौषे तो बर एम पुग कौ मनाम कोम्मविषदराभे गट मह्य जर भमूम्य है! यटि एम निजान्‌ के पुमे पनूप्यं षणौ ददि पया ओर ह्य कौ मधुरिमा से खगन हिप पृष्वी शर म्दग निर्यागि तौ कर सका मौर एम गबौन्‌ सामाण्ि जीषम यके सिन मौर गम्दि्य मनुप्य रे जोदन प्रमि मीम भनुराग भवीन भरमा भौरस्क्न मही मर मरणात यष दरी कषा रि मर्य

~ ०८ ~

जर्डेर, जमाव श्वर पीडितः जाति अर्यं मे भिमाजित रक्तक प्यायी मनूप्य जाध्ि का जत हौ ायि। हतु जिस जोगन की महिमा मुग्र मूष से दानिक जौर कथि गदि जाए है, जिषे क्ियाकषठापां भौर मतकरो का भिष्मेण कर जाजकेकडानिष शक्य मौरमुडैष्ड सर्ममयी धक कमेक पूप्वी का गौरे मानष आति कं निष्वकोहौ दष प्रकारे ीता-जापता नरक षेमाए रहेमी एस पर पी तरु बिष्वाप्र गही होधा। न्ह गिचारभाशमो स्मरतो मौर कस्पता से प्रेप्वि हकर ने मुगषाजौ" ओर श्राभ्या' शै वम पि्या। प्राम्याके किए युगमाषी पृष्ठ मूभिकाकामक्ररतीहै। परम्म की भूमिका हनि प्रामौर्भोके परति मपनी जिस दिकः ानुमूवि श्री जाव किसी है, ज्छपरमेरे गाकोतरफोमे मुत परजापेपद््एहै। ध्रामभ्ीषनमे मिककेर उसके भीतर यै षरिप्‌ शी भिधा कते भ्राम भनताको "र्क्व मामके लीगो'कैेशपमें लष देशा दै, एक सरणोम्मृञो पंस्कृति फे जवपव स्वस्म रेशा है, वीर श्ार्मोकोसामंतमुभकेषद्रकेस्पमे) भह तो मानर्ब सोक सही रे यह्‌ हैत्रक परिचित माष्व का प्राम छम्मवा सस्ति से निर्बासित। मारके दूरगत शी पाणा घे ओतमोत ममम्तिक सिप अन्पाजाते कौ सूभी पह रोमाजक। प्राय कनो दनि प्राम्मा क्षी रममूमि बनाया पि तीविर्मो के मभक्दि पथ आसिरपाविके ब॑षन निभत कम ह, तिपत कमफल -गीयन चक सताठम | शस्हधिकृ षष्टि पि जिन भिय अधिय या घ्म भिभ्याके बोषधे ब्नगन का जीमन परिजाष्म्ठि हेता है रतकी पेषिहासिकः उप्योपिता नेष्ट हो शुको) बेरे कटयुसे निघ युय युप की मेवार्मा अभिरित हेती पठि निनि करतौ पतित) --

- २९-

पृष्व श्ाएमाख है लाज एक रे महाम्राम' केकिएमी षरितार्थ शली दै। एस प्रर शमे प्रामीर्णो को "माबी के स्वप्णपटःर्मे सिनिव म्पि, भिस्मे--

श्माज भिट गए शेन्य दुख सव धुषा तपा के कदन भाबी स्रो के पट पर युग जीबन करता मर्वन। पराम नहीं बे नगर नही मे -मुष्ठ पिघ्ामौ" क्षमसे चोयन गे शुदता मिशविरु मिट गर मनुज जीवन घे

मिष धुना परं लकी बर्तेमान शा श्राम याज है पृष्ठ जर्नो भी करण कषा जीवितः प्रमागित हर है दन्तु जनता की इष सास्ृधिक मूलपु के कारा पर ममील बिजार भार पर्यप्ठ प्रकाण डाखती है भौर भहा बे म्यभ्तिगही रहते परु एर प्रसासी के मढत जति एसौमिए # न्ह बौदिक सहागुमूषि रेका

आज सुन्दर क्षमते सूर, प्रिय पीडित गोपित णन जीबतके शैन्यो से जर्जर मानब मुल हरता मन) षा

शुषा पमं भण धं्र- रन पि प्रिय जीव जन जीबन भमवा

शनक कामी मनुय बीज यह्‌ घोष हृदय उट्ठा पमरीज" मदि पृच्छिय हारिक्ता ते पून्य नौ ई1 यदि मूके सामंद-युग की र्ति कर पुनर्मागरण प्र विरमाय होता तो जनठा मै सस्काो के प्रति मेप हारक सहागुमूलि भी होती त्ब सिसता --शस तापाग चं (अन मन्ध) बालगरहै एम हना मरह सके मन्दरषा यष भभौ निमेलहै।- जो पुन्जगिरन कौ मोर दमित षरा परयैने श्ना ै-भल तारा भा पानौ घु गया है एमङ्मिपूणं जनमे षाम नौ ज्रकेगा उमम मिष्य बे ततिए्‌ कपयोगी नया (संति)

-१* -

भरणा पक्ेमा। -भो एांक्तरिक क्र॑ति कौ वोर हस्य करताहै। भि ष्हाशणकामुलकुरपङ्ही गही शहा है 'कूरिषठ पिति णमक केवल मागता बौर षएडनुमूति रे केसे काम जघ पकता) षह त्तो प्रामीणो के बुर्मम्यि पर भँसू बहनि या परभीन सुषापस्त सिनो को ठपस्वी की उपाभिरेने के सिवा मे गये गीषे जा पकती] इस प्रकार शौ भोषी सषानुमूषि पाष्या कष्य (पिदी पौयद्री) घे छनि जे जलिः भानि के सङके जह्‌ बुर्ढाण भ्रामबध्‌ भ्हात' भादि कभक्तामो शो दाया है जिल भवैमानं प्रलाली के भ्रिकारःध्रामौर्णो की दर्गदि का वर्णग होते के कारणम बते घहुगष्ीमे माष्कतीभी।

शो* एष क्षारे ने मी निम्न भर्म षौ मालभता का चिन क्या जौरभह घन्ह हार्किता बे सका है पर्मोर्नोकेषक्ि स्पिक उ्पकरर्णो मे बढ़ा मारौ वतर है। ठसक पर्बहाए (मपीतने घंपं मे जाई हुई भना) शौ बीमारी उनके राजनीयिक वर्म सरकार जिनका हारे ने चिद्या है। नपने देष क्रे भनणमूह (मोक) षो धौमारी चसे कटौ पहरी जप्या्मिक्णाके पाम मे सङि एीतिन एवं कौषविस्वार्यो के शप पषराए (फोपिकाष्ड) चमे घापिक षसकार रेष के पात्र अपनौ परिस्बितियो के भि षषे मोर

संक्षि है। द्वाभ्या के दरिाधापपभ जपनी परिक्विथिपो हौ शीव भद्‌ श्रौर बजेतत।

अण्ममूद, धङृमूत हृटौ धूप बिभि कर्पक भून ममत्व ष्टौ मूत कपयो का चिर रक्षष।

हिर मासेख जीबन के मूषो के एर्व मे प्रानिपस्मीय मनोभितलान (जाप्लोजिकह पाट) घे प्रमाभितत हया है, मै एविहालिक बिभारषाय िः शिक्य कारणस्ष्ट टौ रि ¢ घन्‌ १९४० {० दक प्पपीत दप कामि डा है। डरे जहां व्रष-नौड्न (देक्ससिघष) धे मुश्वि

~-११ ~

षा एजनीषिक भाषिक शोपलसे। पिर मी युष निश्वास है मिङ्वप्पाष्ोपृङृर देसानहीक्डाणा सकद दने दणिमारायणके पति इषपदनणा रला ४।

एनिष्एदिक निषारपाण अभिक प्रमाविव एसलिए मी हेमा पिर्म कत्पमा के सो को जिद भौर बास्यनिक पप मिषता 1 एपाकाद केः दिप्राहीन पूय सूर्म बारा सति कस्पनिष मरमे बाह्ली मथा रहस्यबादि निर्जन भरष्य िषर पर शान हौ तिम के भाल कस्मा को एक हरी मरी ठोष अनपूरणे परती मिरु भाती है)

शाद रै हो पणन? पृषु भीषा गहन पगम ? निद शुत्प, नि्मन मिस्वन?

रैवो गृषो, स्वगिषटमू को)

मानष पुष्यप्रमूको!-

6

फ़त पर्वन कौ भोर दमित करता ६! कितनी निर्य भङ़ान दाना परती के पास' बाती रहागध के भनुखार एषिषिष भृमि पर उष्ठर भामे पे कस्पनाके किए जीषनषे वयक दामा पू्म भौरशफारहो जाहि भौरि बाभिग्म प्यायः सादौ देमादपा्य, प्राह प्रीति भ्म शति श्प मे एव भिप्रभिप्र एञलौनिक मपि ष्यवरवापो पर संढ दिमस्व मुय शी साम्भिक केठलाका जान मधि यार हो णवा &।

प्रमो तीम स्यो कैः तुमभे जत जीभन प्रर भावादगं ते सिद कर सक सामृरिरु योन दति"

पर मनुमार मभ्य पुय भम्र्मुती सयस्लिक पमति मिदाराशत णन्‌ मजु वे हिर प्याबहरिषि उपयोतिता के प्रनि मेय दि-षाम उट गया

~ ३२ ~

मौर बस्तुषिभब पर टौ जम्‌ रभ का मा गिमभ मगहनिध' श्प के आधार परमे हृदय सजीन यूम कौ सूविभार्ी के अमुख्य एसी घामूिक सासकृधिकृ चैठमा की कल्पता करमो कमा जिसमे मनुष्य के दषम को सामठं युप फौ सुद चेतना का भोज दूम णाय | प्राप भमा पौष जनघमूह कौ दृष्ट से अतृप्त च्छर्जो का सामूहिक सात्विक भिका (चबक्िमेष्ठव) किया भा सशता है एसे नैविष तम्य की म्पाबहारिषला परभ मुभे षदेह होते श्या अगजाकरदौ करयो एर भृष्ट काटा का कोने मस्यकर्यमि (भू) मनीनिल्षनि (रेप सराशकलजी ) के दृष्टिकोण पे शी कयामा जा सकता मारत छौ मप्ययुग की तैतिकता का श्य ही मयूष्छं बासणा गौर मूक षैष्णा षो भम देना रहा जिषे अगण के ईष्नन किमो के कते एष पूरमौण के पष भी प्रमाभित हपु ६। संघार मं षमी रेषो कौ घं्कृतिपां मतौ साम्यम की वैविकता से पीडि ईै। हमारी शुषा (प्ति) काम (स्वी) फैलिएजमी महौ भावना बनौ ¢। पुरानी दुमिया का घां्कतषठिक पगु भमौ निप्कियि गहौ हुमा है भौर पेतु परिस्मिटिर्पौ को जम्म वही रे रहा है, जित पर जब्त प्ामाजिग भर्बणो घे उदित लंजील परकापत (जतत) मानष जावि कषा तीन्‌ भारिक हदय बण सके “पत पणेः भाज श्प होमे को ओौ' भवे प्रकाप् मभ स्मिकियों के र्थन जे हो भव घनैः उब षडा मगुज कौ नव॒ आत्मा पस्कतिक इवय मेरौ कषमना नभिप्य कौ उठ मनुष्या मौर सामाजिका को भिनिट कएने पूश्च का भनुमय कते षी विषकामाषारपेविष्ामिक सत्प है। पशि्धिक पम्द का प्रयोय इतिहा मिज्ानहौ फेनर्बभं कर ष्टा मो वृत्य भौर पष्टाके मृषि मिका के भिममों का निक्यभ करा सानम जून मन ङ्प भाम दरोतै परिधि पुयपत्‌। # षह

~ ३द्‌ ~

श्ना प्ामूषिक मिश्र मे बाह्य स्मि से प्रस्व ्ोकर (1 कौ कदभेतना (च्ौ), ददनुकूक पहर हौ पिकथिव हो जाती १) मषा

| भव मरम निपमो चै स्बमं प्रबतिति

मागम भा बच्ेतन मग हो पया भाज परिषखिति। पु ख्केषाद मी भमुष्य कै उपभेदन (पबषंयधर) के याधित भिगत यंनपिकि पूरो को पविभ्रएे हवी जिस प्रिपाम बाह षा, वाब ही

षष्टे मय विषपिति मिष्चैतम {मगकरंसप्र) ष्पद पवृ होकर षीम सत्प

का धमन्य मौ क्र्वा ष्लाईै।

भमपपन ते परौ ्कपमा जिन निष्कपो पर्‌ प्च सक है, उनका मेते सारप्रतेपमं निष्प कमे

मे का प्रयल क्िहै। मै कृस्या केषत्य तवना भौ

षै कना को मिम्पिन िषाग्पारार्नो धे मेरा भिसी द, उन

कै कीमेने चेष्टा कम है) मेय निभार है किकीया प्या भनौ पमौ रना मे मेम मपनी श्यना करी. गी रोद, शा पमाये उन प्र मृस्प स्म घे ष्डाहै। पेपख्म ज्षषौ पुष्टि के खि पौन स्पपिकाम

कताकाकहा भा। बहमाहि्पमे मिभारगरांति भ्म बुप बही 1 कु, क्या चितकषा शष मृग के काद्र

- १४

देय नगील ठेकलीकां का प्रपोय माभषर रहे जिनका खपयोम मबिप्प भे अभिक संगतिपूं इये क्या जा सकेगा! जमरभ-पुब के कर्मर्यो मं कभिगुड कालिदास ओर रथीनाणकी तरट्‌, कला का नत्यन्त धुचाद मिख्मल बौर मार्जन रेने को भिख्ता ६1 वीना रमी भपनी रागो मै घाम॑व-पूग के मस्त कलामेमव का मवौन स्प से उपयोग कर षके दये परपूर्नं कतालमरू, षछगीदमय माश्मर्मप भौर श्मनि एवि एवं एाहित्व-पष्य सथाश्शिगों धक परए कोर हो पषठा है इसके लिय एेचििषिके कारण भौ नही है) भार से संपल्त रे का एमस्वं सार्मतकात्रीग बाढमक भपने युग के सांकपिक मध्य का निस्म प्मापौ प्न देखन के छिद दुगे पके अते भपतौ समस्त पमिति को ध्मपकए रषि भलोक््ति महीप छौ तरह, एक ही भार रमे प्रण्बषति होकर, जपने अपौकिक सौन्दर्य के प्रकापर्मे षार शो परिप्तावित कर पपाहै। छिरभीमेस्वौकारक्प्णाहु मिष मिरमेययनयुय के नघात रिष्म पराजित एषे भसद्धे करनेार को भिजारो नौर पाकमाभो। कौ अमिज्यकनिधि के अनुक कला छा यथोचित एषं यपासंम प्रगोन कएने श्राहिए। जपन मूम-पर्स्मिचिर्मो से प्रमाभित होकर सा्ित्प रप योतितााड हौ को प्रू क्यान दैवा छेकित सोने छो ूनंषित करते की चेष्टा स्मप्मकार को सभेष्य कलौ चारप!

मग्धिवाद एपयोगिवाभार हौ का दख भाम है। भरे सी पूरन कास्य पदैव प्रायि हीषो भोर रा पर आाधूमिक प्रगपिगार पि हामिक लान दे भतार पर जनमाज की घामूरिकः प्रगयि के विदधतो का पपात है) समे देह गहौ छि मतुप्य का ामूहिके भ्वकिचत जके वैमग्तिक णौवण परपकौ ह्न भरो वै पूति महौ करता चके भ्यक्विमत सुख बुल राप्य बिहह भागि कौ माबनाए्‌ रसे स्वमा भौर इथि का दभिष्प पद्ध मुण-किरिपता प्रहठिमा भादि का पितौ पौ हामाजिषट जीवन्‌ के मीर मपला पृषभः कौर जिगिष्ट स्यान पया छिद एष भी दब्देह्‌ पटौ सि एक जिकसिव घामाजिक

- १६ -

हिमा बहा मादी मानबता के एत्प का षणढताूर्ेक जानीषे चका बौर बहा किसी कारणम पती कर्पना के केन से युव पा मिर्षय षो णया बहा मेरी र्नाथ पर मेरे खष्ययम का प्रभाव अधिक्‌ परवह हेखठाई भौर 8 केबड जपिक एरय कोटे काहू! इष मूभिष्ा मे ममे प्रस्नाबही के उतर्णेकामौषममेपकर ष्ाहैः गोमु र्भी ब्स्यायन थी ते प्ररे भामोचष की हैसिवत् से वाकतषडिमा रेणे इ्रार्कारट दिप जामे फे श्प तैवारक्ी भी भौर जिरके बू छि प्रस्नोचरो का आष्मय प्रस्तुत सप्र छम्मिशिति रचनां प्रक़ाष डालने के छिपु मुले भावस्यक्‌ परतौठ हुवा एके शयु मे उक्र प्रपि वपती हृतजता प्रकट करता

मामष-माज का पमिप्य मुहे विहना उण्ल्यशष जौर प्रकाम चाग पदता है एषे बर्तमाल के भन्मकारकेभौतरसे प्रकट कणा त्तमा ही कलन मौ गता है! भषिप्य करे सादित्पिकको एस जुग के षाद भिदो अर्बकषारब भौर राजनीति के मतरे द्वारा संधिग्बकाड केषूणा प्रेप कृकह्‌ के बाताबरण के मी्तर्से मपने को भाणौ मही रेणौ पद्ेपी। स्स प्ामते जज के दकु प्॑षपं जान विज्ञान स्वप्न कृकपता सव बुलमिल कर एक्‌ जीभ परामानिष्ा भौर पाक्कृतिक जेतला के रप द्रं भास्तबिष एषः साकार हो गयेे। क्तमान गुद शौर एकपात के पार बहु एक वीण प्रषु, निकसित भौर हेपतौ- मोख्तौ हृ, भि्व-निमणि मे निर्व माभभ्या पचे जनौ सूृमन-ध्ामग्रौ पर्ण कर सकेमा। परिजर्तने काप फे भिूम्ण डेखक कौ अत्यन्त पीमापुं मौर पार कठिनाय ह! इन पृष्ठं मे जपने मे किमे मे गरि कदी जात-भूजण सप धि अामप्हापा का मागना ययाहो तौ उक पु रिक येद प्ट करता हू) मेने क-कहौ मयने डो इषएवा है बौद पाय निमपूरभं पिरान्तों का भिस्तापूर्क समाबानं मौ नही

म्पा! भन्तसेयेप्राम्या दौ अन्तिम भिनय' घेरो पक्िपाौ खृत कर लनी दो बिराम देता हे

~ ३७ ~

हो भरमि अनो षी जगत स्वगं --जीबन का धर मम मानब को दो प्रभू, मग मानवता का अर।

सिवरीमषम, मक्मोक़ा घुरमिध्रानदन पंत १५. स्षिम्बर १९४१

प्रस्तुत सस्करण

जाभूनिकष्मिभाम रके एस सस्करय मेने यजनत परिजर्तत परिवरपन फर धिप है जिसे यह मेरी वर्तमान बिषापपाय का प्रपि निभिल कर सकफे प्रस्त संस्करण छी पृष्ठमूमि को स्यष्ट करन केशि उचः तपा चिदबण' की मूमिकाए्‌ भी सहायक धिर होगी

१८७ शौ कप्तृरबा गभो मागं सुभिप्रामदन पत इलाहाबात

रभ्रा ६०

आधुनिक कवि

4 अरि भभम कमम #।

3 ननन पीठ लितमन चिम्ुर छनन नो विद्‌ दज मग ८. कलग्य ल= तव कम नदर्‌ म) मते

फििमम

~ -तपन सप्‌ = लत प्रयते -प्प्नसत "स्‌ ग्स्त य,

~ -सख. ह;

५८ -५९ पेण ^\५

८८ न्त (सतगर्षन

‰0 ग्मिर्डष 4 ~ ल- > 9 ०८९

तपुर सोनम ७९ -पे५->६५ #ि कभित्पजञा ६2८ --~

उन्पन्प्‌ ०,४५. सरन्द कष्य ८५१

= 8 ०, नौका पथिषार- > -प-५०

५५ अस्स ~ -५८ पतन _ + ०,९०.१ स्नष्स्म्‌

< 0 11> गर पनर दर = ~ ~ 1, -- ९९

३०५ 3

णेृषटमो ष्टी मृदु छाया, णोकपरषरिे मी मामा बके ¡ तेरे बाल-जार मे दते उरुक दं छोषन ? मूस अमीसे षस जग को] पवङ्प्ररखतरर्गोषो ८, ~ म्न प्त्बनुप $ सगो को >~ परे भ्रू गोसे कसे बिपया दु मिन मूम सामन्‌? "शमम्‌ भू अमोदेष्यनगको] नभो मा मह्‌ कोमण बोर पुरुप उपमौ & मृष कौ भीषा मनमोल कह तथरेरेषहीप्रियस्वरसे कसे मरुं समनि रवभ)

कफ सफ अप्स \ भूर मभीश्रष्छठणग को] सया-मप्मित किसक्य-द शषा-पम उषा जर

य, भणणएमृत ही के मरमेंक्षसे बता जीबन)

मूक भमौ ्यजगको)

(१९१८)

मा भरे जीबल कौ हार धै संयूल इषम हार हो अपुकनों काः यह्‌ उपहारा भे सफ श्रमो का धार शिरे मस्व का हो उग्ग्बछ प्ममथरूमम मुष्तशकार | भरे भूरि हर्श का भार वी चरु एच्छाका फञष्ो तैरी भाषा का ग्यबार रे सषि एषि पह षाणार मा! हेरौ निर्भमदा ष्ठो निव हैरे पूनम डे उपार मौ भिम है ारनार)

कनबरौ (१९१८)

परमम सस्मि का आमा रमिणि।

मे ये पष्टबाना ? कह कहौ है बाल निहुगिमि ! पाया षने यहु गामा

#५. षी दु स्वपन-मीु मे

भूम॒ षह चै भूम दरार परए महष = चुगन्‌ नाना चष जुम साना 3

एमि किरणो पे उदर्छरक्र

०२. मू पर शाम्‌ _नमणर नु शूप कलिर्योकामूदु मूग पिता ण्डे ये मूमकाना

श्नहु-हौम हे दीपक स्पन्यय प्व पून भेर के भाव, अनवन

पिब चये स्त्म मदत स्प खम नै चा मंष्प छाना (वत पट)

ष्क उदी स्एूमा तरसवानिनि | घा पु स्वागठ क्ण माना 4 तुषो मंपर्यामिनि | अतलाया सषा जाना

# भिक्त पुष्टि के जगम छे ~ छमपन्ठन अहु पमन्दौीण अक र्द्डे चे कर निधि भका कृ टोना-माता ह)

तत्न छिपा णी षी मूख वाधि भा ८६ ४४ कै भग दै हो = कमल कक बरी षा गदि कोक _ पे_ दीगाना लि | भी एम्िपां स्वश्व जम जङ़-बेतम परब एकाकाए तनित तिव हेर भं केषा ` षणो भाना नाभा

छौ हौ पहर बू इपिगि।

भाया जामृचि का पाना न्ती ौमूक-पौरम का गमभारिभि। 5 पन दिपा वाना भना

नकार ठम मागो षा = ` ग्पोधि-पूज सं हो षकार,

बदलत गपा दूत जमतजाछ मे

भर॒ कर नाम-श्प माना

[9 (~ पुण्ड हो बरमवान गष्व _ कना अबीर

घषक ` $दम-अबपे पर दिक मोघी का सखा बना

(~

डः ५५

एक बौना कौ मृवु कारा

कह है सुन्यरता का पार]

पुम्डौ किस दप सूकमाि,

दिश्ाद 1 साकार) वुम्डारे षूल मे बा मारन

व॒ मे प्रावन्‌ पंपा स्नान ` पुम्हारी गाली मौ कस्पाणि।' भिमेली की र्द्ते का गान। अपरिमित चितन मे भा प्रात

भुषामम सार्घो म॑ स्पच्रा्, वुम्हारी छाया यै बाषार, पुलद बेप्टानो बं भामार)

8 कण _ भौषटो मु बा. षास भे सेब का 4 वुम्दायै मर्थो मै कष

प्रेम तै पावा ना

कपो मौ उर के मूपु माम प्रष्णय नपा मे पि बता एड स्वतो मँ सेको मृष भियो तर मपर बुरान| छपा का बा उर प्रं जादास्र मृष का मुखर मं मृदुर भिक्ष चारनी शा स्ममाब मासं किणे मे ब्ब के पांसि।

को यामे अब हय | एप जघान को॥ तिपुबनकी भीमौ अरसवही षी

॥, मासु से

जिह है मवा मह्‌ भरदान]

कृल्ना मँ है कसकली-वेदना

भम्‌ मे बीता सिखष्वा णान शून्य माहा मृ पुरौठे षद रै, मबुरल्यकाक्याकहौं भवान है]

भिमोगी _ होया पहिला शषि माह छि ममा ष्ोया मान हमक कर खर्बो से भूपभाप

मही होपी कमिता जलजान |

ह्व किष छर्‌

रभ

ज्वा चपमे उर का पार

भसि भग वूं

उपार

गुव यहु ममूक्र्नो फा हार||

भषिप् शऋदु-घा जीषने छमद़ा अपाए मन,

पूवे भूते चागते मेद भरे नप ~ रूनी

पूवे है तित जरण कक्षां पे कोमतत

छर मे अगणित भृहूभाव

हाय पाष

कमो शुक प्ते मपहप।

तिषाहा (4 षे, लबोढा दाल अथान उपदा प्रमूमो के ह्व स्क चणदौ खत्म [५

अकलौ मारुता सौ प्रग कण्ठी मूषु मात शिष्ट र्ठ्ता बृ णठ दहृ जाये है पष जाए वा हः. ~ पदा

= पएपषनुपो ~ पा भमी चुबट दारण #॥ 11 सोनही मूषा

दुम्हारे हौ मू हो भ्यात मघे कृता ठष बन्न जाने घुमे रे अष्टो क्या भादाम| : > बाद के छापामम भेष भूमे भला पेल भगगि भौ" म्बरं के मे देल शर मे ज्य बल्य भे पू] ्िश्चर पर भिर मष्त-रलबाढ भमु मे मरवा भा भव स्वर, मेषो के बा रणदो बे मूषि गिरि पर|

षए्रषनु षो पुष कररकार

पपी की बहु पीन्‌ पुकार, निक्तो षी मारौ प्र्‌ क्ष्‌ ्ीगरो की प्ीनी प्षितिकार पनां की गूढ गमीर बहर भितु्मो शो नती नकार शादूरो भे दुहो स्वर

भि) इष्य हर्दे ष॒ भिविष प्रकार षय 53 लोर खर लम रीत पेन रेषीपा भू-मूरबप-- पत की परमि मो बारन्नार-- ठि ह््पिी का पुदुषूर सूल्ला प्ररर्नो टा पलमक हार जहद-पट से दिखा मुल-बनदर पशष पल पक चपण्ा 2 मार 4

उर पर मूषरसा ९. सूम पर देवी £ साकार

(१९२२)

ष्व पर, उस ईष्दु-मूञख परः सभडही चे ष्डे प्ररे वमन भो चदय लाज से रक्विम बे-ररषं को पूरं भां पर भर्‌ शितीय जपू्वंना। जाक रजनौ पी मणक बौ शेरती प्रमित हौ सषि के बदतके बीभर्गे अचल रेयान्पति केमौ नौ कर दौ परमु्लवा मृच्च ष्टो धुषनि के काभ्यमे।

एक परम मेरे म्रिवा कै दुम पक्क बे ष्ठे स्मर, पष्य गीषे गिरे, अपता ते इष निष्ठम्मित पकक ते बढ़ किया मानी प्रथम सम्डत्प षा। लाज कौ माक सुप षौ लान्िमा फैल गार्लो मँ मवीनः पूलाग-से ` छकतौ भौ बढ़ पौ शीन्दरवं षौ मभशूके धरस्मित भौ घे घीष ष्व नङ म--शप के जवते चूम-फिए कर, लाव ते दिके गयन गदी दे मरटेक कर, भटक कर्‌, सारघेव कए तस्ण सौनर्यके

शव प्रप के अथम परिचय मूक्ठा दे शौ धी हृ करो ठमत्व घे बैठ करर वैते निष्ट षी घनन्तो जिनतं बाणौ ये परिवाहेर्मो क्ए--

शसृकि-पोभे। जो परिह माहव भ्रमर ख्ब्य हो दमने गाया इदम धे एक वर छरण से उको गबा दूषरी मे क्यो इबाती षो पुन? शरम कष्टकः घि मजानक् भिदो शो सूमन तरसे बिग हैहो शुका निय बया से प्रमित उरर्मेस्मानदे क्या सरस निकास बोगी हुम उसे? भनि उष्ूकर त्िमिरि षा बृरुण्क्य > कैक जामा मे जिरते कमल प्रिम भिना शमन्षेप मेरे हृष्य की पणय करिका की तुम्ही परिय कान्ति हो।

मह्‌ बिम्ब ] कठोर हृदये ! मम्न को नाकः मी त्याः च्करफी दौ ठः निर छा मृप्तको मरोसा है षा गिरि दिसाएं ही अमय नाषार ह| प्लान वेम मही भणापर कौ कणा क्नमूदी भन शति पायी है धयत दीमठा के हो बि्भ्पिव पातर डान षड कर एरूद्ता है प्रीमि घै।

भिप। नियध्िति को षटिनि बहि नही दिपक पड़ी प्रणोमन भार से भष्पता कौ पएंबूचित्त भति सदा एमी £ जह्य मौ भपनाद स। शानि ये भिपुल पुनि हो साम सण उपदृतिं शा मजस मानस प्रिये!

पटह

सीन कर्मारो का मौ लोक्‌ को बृहत्‌ प्रिभिम्ब दिलाता सदा।

सद्‌ के तिस पिणिर कौ मोटय मब सिसन के पलक श्ल सा पूमता कौन मादक करमूके टै पृष्ठा 1 प्रिय! बुम्हारी मृक्ताष्ठी जादसे यड मनोली दणि क्मामरेमषी जो गपा ते गभिष् है दलता रूर होकर भौर बढता है ठेवा भारि पीकर पृष्ठा है पर सदा?

षु ष्ठी हमिर्भ एभिर के पर्वे मे भतिलकीप्वनिर्मे एल्किकीबौषिनें एक पत्पुक्ता न्चिरलौ धौ सरत सुम षी स्मिपिर्मे कताके नपर मरं। निर्ग परल्क मेरी किक्क्ठा साब हौ बनि से रखप्धै मूने्िनि तै एठा 8 निज प्सेह्‌ प्यामख बृष्टि सचे

कर दी षष्टि भेदौ दीप सौ।

(१९२ )}

ब्रादत

६५

मुसि केम ननुच के भरौ मृष्ुषर मंषदरूत कौ सजल कल्पना 2

भावकः के चिर जीषनषरा

<~ मुम 4 2 मृष्य ममौ

सभम प्वाकठि के मुक्ताज गिग दर्पं रे मर्गं बिदा भृयक बाकि के णहा

जसापर्मो मै कमष्ट दलो-षा

कम सिहता निह षुष्र,

पर बारक-मा बापु एकल इल

षरि दवा चुन सत्वर > पु णहे रल पलों मे पूराषा अद साम बही चील एा प्पट ह्‌ मह्‌ मशो ठे उठा उपर

भूमिनाबै यं शिप बिहु

पा कोपर रोमिश पेत

एप भमक्य अर्फर बीमो

मेये लि पुर जए पक,

| | 3

|

(|

किपूष भकपभा-ते जरिमुगन की भिभिप क्य पर, भर मम भक हिम ष्टि भौदा कनदु बे णा नम्ह वर पै निक

कहु

कमौ नभाक भूवौ कणा मकध भिषट महा

ककृक कङ्क जम हते हम एब षरा उख्या है सार

फिर प्रियो ङे बण्णो-ते इम पूमग पीप के पृ पसा,

मुद पैसे शुषि श्योत्ना मे

पक्के हमत के करर मूकुमाए।

स्व्भसते एम मृदुष्णनि षक्र

पिम-प्वेषर च्लाम। इष्ण भिचुटाम भा भरत ककषतुप शी कर्‌ टकार, १द्‌-स निर्बोपित हो (षा बििलो-षा जघ्ार भू्ण॑भूर्ण षर षथगुष भूबर श्रो नधि भौमाकाष बरोग भाषकरेता-से

ष्पे हम भि मापू-भिहार।

स्पोम-भिपिन ये जब बसन्त लिलता जवं पल्सवितर प्रमा महते हम सब मर्निसनसोत में पिर ठमाषन्ठम केने पाह

उराच घे बा टु फिर चङ मम्बर मे म्गदात कैफ स्व्णपं्ला हमः मी & कते एत मास्त से बात।

4५

(4 परे पगमे चट, बृ भपप घीध भण्टोर, षम के उर मे उम मोहसे कासा ते निधि मोर

षनदरवाप सी भ्पोम भृकुटि पर शरक मौन चिन्वान चोर, घोप भरे विष्ठब-मयनये हम छा जि एत बार्यो भार

पवेत से पु बृण्ि धूति मे पर्षवे बते पफ मे पाकमार-- काले-बकते श्वत मिष पल भे ेलपर, छर जस-पार

कभी हषा भं महल बना षर, भरतु बाप शर कमी भपार, हेम भि्ीन हो जति पहमा बिमग-मूवि हीमे निस्छार।

चप्रीम

पादप मे मृषि करिया को

भ्रव कष्ठे दिमजल शभ “देम घागर के पव हठ भे भूम पमन करी धूल भनि पन स्या कै पल्लव कारिजिखिन भमुपा के मू

तन जनि मभि. मन ~ रष्िक-मस्म मारय के मषी भणते बरु मलप्नमः पिनि के ठम पामक के दरक योमबश्नि दापो षी गति भमन कै णाम म॒ प्के वारो ष्टौ दता

कै हम प्थिङ़्यान पषन-केनु, रभि ढ़ पाप्म भिरल-भितान

| ¢ \ कन

ष्पे श्या यशस्‌ ७५ कभ कौ माता है इषा प्यान। रोकने परभी षौ सलि हाय शौ स्कती है यह मुसकान। भिपिन मै पास कन्से वीप मुषोम प्सा सौ घौ भाष खमग ष्टो उषे निठं उर बीच मही रख सती निक दरब! कस्पना के ये पिष पादात हा देठे है मुषे पिदान। श्हारको से पक. पर कू मीव इए केशे गष मब भाष षमी इत हिम षी णपु बुद शृते मुष्रमे भिर पनाम गुढगुदावैे पे तनम म्न प्राण मही स्फ्पौी तब पुं मूषकाम ! जी उदते-पर्तो के साप मूषे पिते भेर सुकुमार ` भदरषए शर्ण है निजं हाप षते छर मू्मो उष पार महौ मती मै जम का जरात मौर हे पठती भतमाम। फेष्ये पर भी हो स्थि] हाप बहौ रकी तड पट्‌ भुमष्न1

मौन निम्र

स्टग्ष ध्योतत्मा मँ अद संसार श्रकित रषा प्पिपू खा नादान जिष्ण दे पको पर पूुरुमाष जिषरठे खड स्थप्न जजान जने नखर से +^, निमन्बप देवा मृषको मौन्‌| खषन मर्थो का भीमाकाघ रजता है नब तठमषाकार, शीषं मएवा पृमीर लिश्वाप्र : ग्र क्षरती भब पागस भार

भाने तेपक तद्वु कीन मुक्ते दयित कृष्वा धम मौन} शश वलुभा फा पौषनमार पूष उषा है जम मर्षूमा भिर चर केसे मृषु उशना भुसुम लव शुल पदो सोज्छषास म॒ भनि सौर के पिह कौन पदे मूषे भगहा मौन भुग्ब मशि कोद ~ ` दिषु मण कर पेयाकार बुष्बुलो का भ्बाकृढ पार बला विथुरा देठौ पञ च्य ठेव शते कर कोष अने मृद्धे बाता मौन]

भै जाने कौन भये हतिमान भान मृहको भबोष भल्लात पुञञाते हो एम पथ भनयान ष्क ते रि नान

भदे पुश बु के घहृषर मौन | मी षह सक्ती दुमहो कौन!

(१९२१) कतिः अनफदणम्‌ सस्तते "नद्‌ "सपुष्प

अषौ

(ध

धा हो सौरम का मभुमास पिर मे षरा पूनी घासि।

[2 भुकी षौ यौभन के मार, मकिञ्बमता मे भिज तत्कर सिहर ऽय्वी-जीगत है भार।

माग पास णद के म] भात फे बनते चहु कणर,

प्रात का घने का षार बहा देती सन्स्या कौ णवा अपह पौल के रग~उमार हर्यौ के दिये नार, कणो विकते बि पपार कृषूमौ कास विबार

भूबते है वके पिनि चार षमी ष्रि हाहाकार।

(२)

आतर बलपन्‌ दन कोम पति पए ़ा पीला पात| शार सनि सुगर रामी रत भोर फिर भन्पार, अदात |

1,

पिपषिर घा धर र्नो का तीर

) पूव रेवा

पाहा के पूल

,

प्रणय का भुग्न फक भौर षर जाते भवो को भुर मृषुल हर्य का हिमरर हास खा जाता निस्वाख क्मीर सरल मौह का षरदाकाध जेर छेते पमे निर पम्मीर)

पन्य सांसा का भिषूर्‌ भियोप षाठः बअभर-मधुर योय, भिकन पष्ठ केव दोषाद्‌ भिर के करप भया |

अरैः मे अपडक चार लयन आठ भप रेल भिष्पाय उ्टे-ेमो के भान कके उट काटो हाप |

(३) म्नसि को धोने के पञ पराम भिखगये पदिष्डणमरीबुषटजाज शुका छता बुद्ध कत की व्याज कार को नी पी फी तण

विपु मथि रस्कः छबि भाक

ष्प्वनु की पी छटा विषा

जिम

अमष छ्िपि जवी है दत्र

मोषिर्वो ज़ी भो कौ डर हिका जा भुपथाप अपार

4

दोपा हषर जम सोन मुरषी उबर मृत्पु क्षण क्षण ममौ रत्ब मौ, हा हव अभौ मषसाद भमू उभ्छ्यास

मभिरता रेड चग कौ भात पूम्प मरा समीर निष्माघ शहा पार्तो पर बूपभाप भप भास मीसाकाण

धियः खस्ता मुद्र का मन, विहर रस्ते उड्गत।

(१९२५)

सत

लिष्डुर परस्विवंन

(१) निष्ठुर परिर्वतन}

च्य शै ष्म रतन

जिम का भरल विरतम्‌ {

हुमहारा _ ही _ नुममोगसीणन

निखिल रशा परतन | भासुकि पह [१ ष्का अहरिति चरण दुम्हारे चिष्नि ङ्य { भय $ मिक ब्व पण छेगोज्छ्बधित स्पपित एूलकार. पुमा ठे § भगाकार जगठी का भम मृत्पू वुम्डाप परण दस्त कर्चुक भ्समान

भसित भिष्व हौ भिर, कुष्य दिई्मथल |

(२) येम विप्मभित्‌}

माते प्रद दकष, मलार्भ पुम्हरे शापन चछ माथ भूमे छत्र भप्यं भाव खषटद एथ के पाष।

हुम भूरि नूप-दै जगती पर बदु अनियत षणे षो ॑सृ्ठि शो रत्पीष्ति पद मर्व मघ्न मगर फर्‌, भरं जवन प्रतिमाए्‌ पण्ण्ति हेष्ठतो विषे दशा कनद निर धलिसित) भाषि प्यापि बहु बूस्टि बात उत्पात भमंगस बहि, दए मूकम्प तुम्हारे पिप सन्प दक, जहे निरदुग | पापा ठे जिनके बिह

हथ हिल ठ्वा है टकम

पष दिति रात

(१) जपत का मनि ह्कम्पन बुहार ही मय भूषन निक्ञिठ पटो का मौम पतन वृष्य हौ भागमतरभ।

, निपुण बापमा विक जिम शा मानम्र पवर्त सने तुम वुट्ठि कास श्मि-ये पुस पल-पल तुम्दीं स्वर सिस्बिते समृति के स्वर्णं पस्य दण श्छमके रेते भपपिस यने बोषित पि प्न ये सदेन ध्नि स्यम्दिछ जमती श्रा विषूमण्यल

वप गमगघा सम्म धुम्हाद हौ चमापि स्पत)

उभी

(ग) काल फा जकृडन मूक मिषा नरे धरम्शारा शी पर्षि विष्व का मभु परणं इिषहाष परम्ार हौ इतिहा |

पक बटोर कटाक्ष वुम्हाय अजिल प्रलयंकर्‌ मर छेह देवा नियं पंपृति पर निर्मर, भूमि भूम जते जप्नष्णय गे भैष्ट प्रष्टं पाभ्न]

अये एक रोमाख्भ चुम्हाप ०) निर गिर प्ते मीव पि प्ये मण ' भाङोपरित जम्युषि फेगापरते कर प्तष्ठफन + मुम्य पूज॑गमन्खा इषि पर करता मर्वण | पिक पिम्णर्मे बद पणाभिप सा निनेतानव

भादाए्व शे मगन भार्तं॑क़रता गष मर्ज॑न।

(५) भे कौ प्त तष भीत्कार केतौ बधिर] प्रे कन। ममू भौर्यो छी भगनिति भार सौचती उर पापाथ।

(९) हाय री र्ब भ्रानि! -- कहं मस्वर भती मे शान्ति? सृष्टि हौ श्च वीत्प्यं सघासि चमत लंमभिरत जीवन सप्राम स्वप्न है बद्‌ चिराप।

एक भ्लौ वप मगर उप्नं एष सौ ष्पे, निगम भन

--पही तो है सकार पमार, धृक, शिस्न कार 1 मार्ज षबोधव हस्यं मपार रस्म दीपादि मम््रोष्ार उमृ के वसं भ्म शिहार क्षिप्वि्पो की भनार तिथि निधिका यहे निर्ण बिगाम मेप मारत का माया जाल)

(१९२९)

(१) प्रस्य का जेनिष्प मर्दन भर्वन भग अग म्मा शिर मे जिर का अन्वेषण भ्व का एतवनूनं शपन्‌ | पामन > अतम से एके भषतः एमन नी शुष्टि की घटौ तर तरम ठमङ़ृ पत पव षबु पुयार भढ जते निषे जता दक्द क्रे ठट भेटि यि शवौ बजात) (२) एके षि के न्रसंस्य उशगन एष हौ सब मे स्पन्दन एष छवि के बिमा च॑ कीन एक भिजि के भाभीन। एक ही पो शहूर णोर उभय मुख श्य निधि भोर, षी पूर्णं नियूम्‌. संसार, सूजन ही है, पंछर। दा महती चयन मृत्यु की प्त खोदी लव शौवन की प्रा पिप्पिर षौ षएर्षं परश्पकर्‌ जाः धौज भती भमत]

{30 तपम} म्कात कुमुमों को मवु भूसकान फरसों मे फषती फिर सम्कान महव्‌ है, शरे, मतम वहिदित जम केव बादाम प्रदात |

(१) एक ही हो भसीम उस्छाख निष्ठे प्र पाता पिषिपाभाष दरण बसनिपि मेँ हरित भिस, शाम्य भ्रम्बर मीक बिका

अही एत्र र्मे प्रेमोभ्य्ास

काम्यम रष दुमूर्मोमे बा

अकष तारक प्न मे हष मो श्रयो मे साच।

जिवि परयो मेँ निनि प्रष्र एक टौ मरमं मपुर प्षषार। 6 बहा प्रा | स्वस्य इलसपमनी तत हर्य मे बमा प्रणय अपार ोचनों प्र सएादष्य्‌ भमनूष रोक षा शिव मनिमर्‌

स्मे प्र स्वनितं मधुर गुकुमार क्ष्य ही म्रेमादूपा

दिम्य सौन्दयं स्नेह साब्र भाषमामप समार!

तीष

(५) स्वीय कर्मो ष्टौ के अ्ुष एक गूम कता निविज प्रभया कटौ रली बमा पूुषुमा भही बेदौ का मार्‌}

(\) कामना के जििष पहर षे ज्यौ कै ठर फे दार, जरमठे शीवन्‌ की कार स्पूि कष्ठे पार ¢ शूम दुर एल पुदिति भपार छल्वी यजरामृत की भार) पिस होये का हिष्ठा दाष ष्मो को रेता जौषत दान भेदा हौ कप कर्‌ प्राणं शम पिशा स्वर्यं षाव | तरष्ठे हम भटो याम ष्णी से गद भि धर्ष प्रकाम सष्ये निद्धि दिनि का पाम षषी मे जप अरभिएम बम है दष्ट मतः अनमोत षता हौ कीन का मोल (७) शिभा दु के दष तुरा निषपरार, रिता कै जौषनु पार

शतम

शौन दर्ग है रे ष्सार, एमौप्रे या छमा बौ! प्यार।

(८) जायन दुक कख का वाहसा, मौर कशा सुख लाम्‌ विषाद समस्या स्वप्न-गृढ संसार, पू्ठि भिखक्ी उख पिर खगत जीवन का मर्थ॑भिकाप मृष, पथि चम षा हष!

(९) श्मारे काम अपने षाम बौ एम जो हम नात भरे नि टाया उपनाम घ्ि है हम जपक्प

णवि गाए £ जब्त सेच कर पात्रे स्वीय स्वरूप

(११२४)

भरार्षगा

णव कै उबर वागत मेँ बसो श्पोतिर्मम णीन | अरपो षु षु वुप्य एर पर हे भिर बम्यय चिर तुरत]. अएठो जमूर्मो मधु परार्भो अपर प्रलपम भत स्मिपि स्वधन अभर परक मं उर भमो मे सूञ्च यौवन ष्प्‌ कै मृत एज कप कए दो धुन तव मे चेतन „3 -मुष्मूरण भब धो णय का दै प्राणों शा भागिनि) बर्पो पुल बन पुलमा बन भरसौो णप जीषन के पम] थि पिध्िव भौ" पतपणम मरपरौ पूति के साषन।

{१४७

मीर भ्न्भ्या में पघन्वे ` शरा है घय

पाम प्ान्दे।

नो

“¬ भगोकेभानव मपर परसो गया निक्षि षम का मर्मर र्पो भीयाके वारे मे स्वर।

प्मष्वम मी हे र्हा कीन निर्य गोपय भय पूमिकीम भूर पूमंग सा जिह्म क्षीण।

पूर $ प्वर षा प्रर भीर कमम पाति भो कीर भर्या प्रपाम्वि को कर गरमीर। पा महयान्वि ष्ठा चर च्दार, चिर भाक़ाला की रीदध पार्‌, मेष शे मारपार। „~ भव हुमा शारपय-स्वणमि शीन बर्-कततु चे निरव ॒हीन। णा $ भजत रये

शुषा भपने मृष षसो पर प्म्-रेण पून्दर पड़ भरा प्रणरततिणिर घे

त्थि भह स्वभ-मिट्ग ज़ गया पोरुनिय भमि गुक्मोद़

रे पसि मग।

तीत भ्यो मपर्योपर्‌ र)

पुम

पक्िम्मम मं हु ठा दैव छर्म्बस भमन्व तभे एक)

अक्प अगिन्ध गेक्तभ एक ण्या मूषिमान भ्यौकिति भिभे१ चरमे हो शौपित मर टेष।

शसि स्वगेष्टांसा का प्रदीप बह्‌क्तिए हुए? निसके समीप;

वृ ण्यो रथत-सीप | द्वे

` खौ जारमा का चिर्-स स्मिर यपलक-गमर्तो का चितन क्या लोग रङ् बाह भूगनापुए } ५८

मरे दर्म वपमापन कमता यहु गिलित बिस्व र्ब निषप्फस इच्छा से निर्भन| -~ ~ भदा का रण्छवम्दि- वैष ^ माफहा मु अत्व भिषक | 4 प्क दठेहौ पट्बर्‌, पद्ेष्िति भद्‌ एाग्र नावौ लहर पर हृहर एहर! भरतच्छहीमे पर्वन करो अगाष रमि प्रि एडगर बुस्यर जराप्ा का बत््म] ङ, का जरते माभ विकल | भया मौरषननीरम तयत सर्गम ' भौवन मिष्य रे प्य भिफल|

पिङ़ीपल का भन्बार्‌, बुसुहु है इषा मूषक-भार सके बिपाद कारे पाए।

किरु मषिधङ पर तारक भमन्ड | तदा तही बद्‌ एन्दबत्| <

षरेमन्व मृष्व मौन भपने मघम सुसमं बिसीन स्थि निमे स्मरुप मे भिर-नवीन।

गिपम-धिला-घा मह भिस्मम जेदवा जगत-गीवम कातम बट्‌ प्रम मबु शूक बह सम वि बृकि-घा भिजम भपार, मपुमय समता भन मयर शका दएषाकी भ्यमामार्‌)

पमषययमय ममा मिन सदे गया बुन्द कियो घ्न षट्‌ भात्म. कौर पह जगदर्पम)

छान्त स्िर्ण श्दोरस्मा दर्ग्बः पञ्चक वनलता तीरम पुनद

धकत-सस्या पर पग्-भथर तस्बयी म॑गा पीप्म-बिर्, दी £ चात्ठ भलाम्ह निर्बल |

ठापद-बाला पगा निर्मर ष्ठि मुख दे बीपित पृदृ कुरे उर्‌ र्‌ कमम व्यु! परः

पररि भन पर सिषहर्यिहप, शूरता तास्व पुण्र श्ैचत धिन पा मीलाम्बर।

धारौ ठौ सिषङेन-सी जिघ्र पर घथि षी रेएमी भिभा चै पर स्िमिटी दै तृ भूषत कहर। शपथः अदन रात कू प्रयम्‌ प्रहर, हम चकते ताव केकर सत्वर!

चिष्या की स्मि-धौपी पर मोती की ज्पोत्वा फी भिर शो पाके दौ खा छपर

मषु मन्द-सन्ब, मन्पर-मन्पर, भु तरि हखिनी-सौ पुण्र विर षी शोक पालो के पर!

लिरजघ् अक सुचि दप पर भिभ्बिधठ हो रमत -पूलिनि निर्भर > बृ उषे रुमठे परप ˆ

शगार का ड-सभम एोपा जरः निषििन्ठ प्रम प्के भे वप्र प्मप्मं पएषण। लीद हे उट्तौ चकहिरोप दिल पर्दे ध्म के शोरकोर) चलीम

-भ्च्फता क्न निय भिर्‌ तोड़ > छया कै कोशे भु निलो

चरौरौ के शमो सौ रक्मक लाची रदिमरपां अलम चव रेष्मा भौ शिजि ठरकसरल।

हर्त को एतिष़र्बो मे लिक तौषौ एति सोप एट्‌ किलि फे पृषे जख मे पएमिल।

१.2 अब उषसा सरथा का प्रवा, लन्गी ते केके पज धाह हैम बे षाट को रहोत्ाह।

ष्पयो-भ्यो लयाी है नाव पार उर मे बाङ्ोष््िति पत भिषार।

धसभाराताक्लौ णमष्टा भम घास्मत दस भौवन का हपूगम शास्वव गवि ष्वद छम!

पास्वय सम का सीका विकेसि प्रासने घथि का यह रजतप घास्य॒ कशर्भु-कहपे का विकात।

हे नम-भौकम के कर्मार [| जिर भ्म-जरमकेषारपार पाष्षत जौषन-नौका-बिहार।

भूक गमा भस्तं दधान भीमम का यह्‌ धावत प्रमाप करता मुरो भमप्तथ-बात्‌। (१९१२)

स्स ~^

निह कस्पनामयि मपि अप्सर!

भविष् भिस्मयाश्मर ! भष अपतौक्ष्कि भमर, अगो भाषो मै भाभार।

निरषं जसंमभ यप को, , ~क गयुमार! मोहिनि छख बिभ्रममपि षिव पार!

एय कौ हुम परिभित भरहर अगण धे शिर भमान

नडे रिपु के क्प छप पिप ष्डती मा कषा भनुमाम

ग्ब भूख चतु नै मृंह मथ्‌ स्तन दान

धप षप सये ररे सूषा भा मा मीरब भान्‌)!

का कै छाया प्य चै मा मिम्‌ चए भं मिद्य

भपये भसय मू + रती स्वप्वि

स्मपार्मो छि अमाय सिग भिभिभर निहत क्यो निव बुम्टष प्न पपात} वागी

अषम स्म मदिरा पे सम्मद

सौगन र्म चखष्म गधि के ष्य मंग ये कपटी पुम भभिरम

भक्तौ छे उर मै स्प 1५1 ह्वी मम प्रधिमाम {८1 पक मुकर्लो प्ति मद कट बेह स्ता छषि भाम) ध्वडोक पष्क भूत्य दघम कष्ती क्पू पद मार द्वि शक्थि च्वेबन धे बभंषढ कर पुर घमा अपार) नम॒ देह पर नेमे रेप पुरु छापापट भकुमार, भो भम की अदी मै एषु छव पुति स्फ्रर।

प्वगीबा रग भक्त अभिहार तुम करती बु मृणा { पके तषे षट भिम्ब के # 1 प्रव श्मव मराल चङ तजय पुत्र फेन कन बन जति उषटु-गाल सर्जन शह पूवि रल शरणे में भिभ्ब्टि सस्धिब माण!

सि एषि जुम्वितर णको पर

गुम मब स्त पार्‌, चौबष्रीष

ष्णा गक से त्श मीद प्धि-- मृग षपू को सूक्रुमार, छोङ रमन ज्रंचङ उगत परम चहु सषु मारः सभु न॒ श्छषनुप पृक करती हो नि षार।

कपरी स्वरव कौ नी तुम मष्छरि, म्बे वपुषा की वाख जम के प्यद के दिस्मय से अपक पकक प्रबाण | ५. भार पुबधिर्मो क्षी पूरसी में शुमा ममो मण प्य मृदु पेम हास घुम चित्तभन श्छ सरस]

चुम्हं पोम्ते छाया बन में भब भी वषि बिश्यात जब जग जग निधि प्रहरी जुगनू सो जि जिर प्राच सिष्टर षु, मर्मर कर चष्वर, ॥); 11 \१ मत्त अम भौ भूपके गिति रेते गुज मधुप कमि घ्रात!

मौस्प्याम ठम बैठ प्रमा-तम मिती प्रात सजात ( मष

षने मशु ममूग एापौबल प्रष्टं शन्बि }! हनि रत पताणीमं

पर्य धू्र समे स्मह दिर # 3.३ क्ती प्रा

मुष रेष्मौ (५५ पल तितरिया इला “» षषी साष्ठ {

दुष णिनि प्सु परेम षौ घोर क्म शुपषाप मुकु एमन प्मप्य देष्ठती सिज निरुपम छथि शाप जदृक दूरमा दे चल शुभ्बित मख्य मृदुल पद चाप शप म्‌ निषवि मधूर्पो धे करती मौतालाप !

मी रेषमौ षम का कोम शोल लो कथमार, तार शरक कहु कूराम्ब स्वप्न-निक् स्तन ईर

पछपिकिर दी णषु पदे रपौ की पुम भभिघार

गथ षे पारख ग्पोनत्ना भं ज्पोमम्मी सी भृष्ुमार।

महरी युत मष काल मि धे भूमि = सुमम िवार भौर रेह पृथि हिम ध्वजे पर ष्फ घाभार पद कषाक्िमा चपा पुक्ड्ति

पथि-स्मवि पन पोषाय, पारम

अय जेप भमि प्ोमा

शेषे 44 युष्मा, भृकुटि संय गेव तव इच्छा के मूर्पो का भवार

एत शत मपु मकंसार्मो चे स्प॑रित्॒ पृश भारः

नगे भाला के मुव मृकर्णो दे चूषित भु पदजरार |

तिकि भिष्मं मै निज पौरव महिमा वमा कर शते निज अपक उर के स्वप्णो धे

प्रतिमा कर निर्माण परल पछ का भिस्मय विधि बिधि की परखिा कर परिणाम दुमद क्प्यना आण रस्य मैं पा विवा भममान|

भप के पद्ध दृद पाप दपि पृष्व ण्वाका से हौ अप भगम प्म मर्ष भृत्प योबमयि निष्यनषीम अतल विष्व पोप भारिमि में मज्जति जवम मौन एम मृष्म जस्पूप् बप्पररौ तिब पुङ स्र वललौत] (कणप १९१२}

अतृतासौष

यश्य लवे दपर नस्पपषपत ८०

(ह पयो जग के जीर्ण पत्रा { मस्वपवस्ठ ] हे पूप्क-पीणं } छि ताप पीर मभु-बाल भीत षरीव शम, णड पुराचीन

निष्ण पिमत-युग}! मृत बहम 1 जग-नीडुं ष्ट मौ दषास-हीप श्रुत धस्त-म्पप्त प्॑चो-से धुम षर क्षर मनन्त हो बिीत |

कड णार चम पले पि वफ संपिर, पर्ष सारी भ्रा षौ मर्मर घे मुसर्वि जीगम षी मांसल हरिया!

म॑गरित विष्व पौवन

अय॒ कर जग का पिक मदबाशी 1 निज ममर प्रणय स्वर मपि चे भरे फिर मब युप की प्यारी

एप १४)

गा, कोक

पा कोक बरसा पावकं कथ | नष्ट भ्रष्ट हो णीर्ब पुतन प्म भरं जगके टृ षन्‌ | पावेक पम बर गाए नूतन हो प्रमि मबक मानेबपन |

षा कोकिष मर्मर कपत} भरे नावि कुर बर्ज पणं 1 भैष नीम््े शङ रति डन प्यक्वि पटर यद राम परप रण घरे मर भिस्मृधि में पत्सल |

पा कोक्कि मा-क मठ भिन्ठव | भगे रभिर पे भर पस्ल्व ठन मष सेह स्रौएम से पौषन कर मंजर्ति मध्य जय श्रीगन गन ष्ठे परौपौमभू घम ब्‌

पा कोड नष गात कर सूजन | प्त माब कै हिवि गूवम मण

सक प्रया हो माग बन करे मनुज रम जीन यापण|

णा, कोक चन्दे सनाठन 1 मानम दिष्य स्यि चिन बहन्‌येह्‌ का मस्वर रब कण | दे काल &ै रे ्गभन मासम का परिय मागवयन कोभ मा मूषित हां सिधि दम!

षष्टि

ष्टि शा बहा गन्बङार श्ढा है रस्मै एक बीज मह्‌ खो ग्या ग्ट बना कोधो षर्सो पे भुव॒ भौड)

चख टे एर भंषिि हप है र्पात शौ स्कन्धमूष पपै हरीतिमा की षंसूषि बहु क्म-रा एल पौर पृश।

बह है मृदौ स॑ ष्क बट के पादप का महाकाएः षार पष्ठ माप्य एक। बाः एक वंद, प्ठागर नपार।

अन्धी चमे बौषम-यंकुर्‌ णो तोढ़ निषिल जम्‌ के बन्धन --

पाने शो है निज प्त्व-मुक्ि। सिर से जप बेत्‌ चैतन

भा चेद पषा पूजल र्य

कों पौ) बहनो सुद पोठ

खतम ब्नन्त षा है निषास

णव जीक्त घे गोत प्रोत] जान

मारव

पुष्टः है किष पुमर्ष सुन्दर, मानष! दुम ष्ये पुष्दरठम शितित्र सबको सिष्नदुपमा पे चुम शिखि पृष्ठि चिर निस्मम। मौवन ज्याका धै जेष्ट तम मृदु तभ न्ग प्ररोह भग स्मार जिन पर मिचिक प्रति छापा प्रका के स्मरन

जामि शप्त वीक रिपर्नो र्म मदिष्ठ सै माषकं दभर भार, भि रो रूगिष्य-रोक श्वर नि्र्-खंगौठ-ार। पृषु उर, उणेज भ्यो घर, घो ठुकृ बाहु प्रकतम्ड प्रेम-बन्भम पीनोर चस्ल्य शीगन-तइ के कर, पष गुजि ल-सिल पोप |

यौषध कौ मासक स्वस्व

धवम ममम

न्धा भसित प्रणममेम का मधुर स्वयं!

ओसाभजिकराप

छम भथक्न विष्णो पिभा लसष्‌-षषु

श्ढ़॒ म्रठा

ब्रवी भूरिया ये ममन्द

ह्याग सष्ानुमृति

धो प्तम्म सम्या के पार्थिव वलि स्वपि -स्वमान-शूि |

मानव का मासब पर प्रत्यय, परिय, मानवता का वि्षास, भिजञान आन का अन्बेपम, घब एक सवर्गे प्रका | प्रभू का भनन्त बरदान तुमह उपमोग ऋणे प्रपिक्षण नबमब या कमी तुमह लिमूमन मै यरि बने रह्‌ एको दुम मानन।

पषपन

लाज

हाय) मृत्य श्रा ठा अमर अपाजि पूज, जम विपण्ण, निर्जमिपड़ाषो जम का बौषन | ह्दनिश्न्धौप मेहो श्टगार मप्म काणेपन शम्न॒क्षबातुर षास-बिहीव चीगित धत | मानभ। एसी मी भिरभरिति क्या जीबन कै परति वाषमा शा भपमान परेव जौ माते ष्ति। 1 परम-अर्थना यही करे हम मरणको रप स्थापित कर कृषाण मरं जीने का प्रांमभ? श्वम को दं हूम स्प रेप आदर माषषका मतिमि को हुम करिव वित्र भनार ध्वका) मूग युग के मूत जणो के ताम मगोहर माग के मोषात्म इष्य में किए हप पर। भूक पए हम जौगत का धन्देप्र भनेर मूको के है मृतक णीभ्तिका पिर)

(अक्टूबर १५)

पर्ल

शष्के घा मसर। के ठत मद्रे सगण, सुम प्ति, न्क मसे पुमे मर सूस \ अलौ से ररे सीमि जथर, चर

मानष भे मि भै अपतापम मानय के गारम्‌ यासी के गण्य सेम पम माण दि एण्य

अभ्पि-मोम हः एन पीर मा दी परह अग पर, डान्पा गा मपिवासम पग मरमप्षर

स्वाछायर & मापा मए समल मौमपर जन णा बहनि दु स्म मा करौ पन सुभ्व कैथ ष्‌ मरा चोप मनुम्‌ बरे तिपयुपहै जडव्राति | ९। सीदि जन सान दो चादि यश मनुगतः मापन ष्य एषह मानष मानब णमी वर्प अनदना लिरमोष क्र गप हारातस्?

(१९१८)

2 \1

ज्लीगत का प्रासाद पठे मु-पर भौर्वमम मित का ाप्नाम्य बणे मिष हित भिरु्रप। जौगन की दमप-बूणि रद्‌ सके भट सूरकषित रक्त माप ष्ी इच्छएे जन की हों पूरिव। मनुज प्रेमे बहौ सढ़--मानम एवर। मौर कौण सा स्वर्गं ष्प्‌ दुध पषणपरः

(१०१८)

[ सौम

ध्र घर्‌ मर्‌ मदु

शेम केसे स्वर मर,

बते मीम दस

षस्य पतसे चंबण

प्मयन स्प से

सेम हर्ष से

हि हि चखव्ये प्रधि पर चस प्रस मूर

घव धघठ मिभित प्वनि कर षट्टष्ङ़णो निर्षर, मदत - कम्प मर!

पूम धूम सूक भूक कए

मीम तीम तड निर्धर

णहि सिहर पद्‌ षर्‌ षर्‌ श्रता घर मर्‌

अर्‌ मर्‌ |

पि पू गए निपिषछ दष हरित गुख्म मोक्ष

शाय भप पे भषिरल पानु-पभ्नसे बज कर|

पिक धिकः सासि मर भौत पीठं दृग नित

मीम दश सफल

प्र प्र पषनै पल पस!

॥।

दापू

क्विनि तर्षो धै णड जाजोमे तुम माबौ मामषेष्ो? क्स प्रकते मर जानोगे दख समरोन्मूकध मवको? सस्य षटिसा धै जोकि होगा मानव का मन? स्मर पम मभुरस्वगं बन भएमा बौवग बत्मा की महिमा दै मणि होगी भव मानबता? प्रम प्रि से भिर निरम्य षो जाएमी पाक्त?

(१९१८)

चाट

बापू | तुमने मुन मा्माका वैणपक्षि माह्ञान इख उव्वे येमहर्पस्र पूरुभ्पि होते प्राज। मृतमाड उष भरा स्वर्गं के किरु मार पपाते भहा जत्म-अरपेन जनादि से घमासौन भम्हान | भौ जनना पुग विर्व मे होगा मतिना अम क्षप पर, मनुप्य को श्वष्य बहिसा इष्ट रहेगे निष्बय | लम सतति के इते | देबतानो शा कएने काम मतेब त्मा को उवारभे माए तुम बणिमारयं|

सवहर्

धूषरष्टिखंवौत क्लीम हो निर्म यग जीवन संबपं दमं मनुज स्वमाष्टो यिका दोय-दूद निरथं { एकदश सहन एर से बाह्य मैशप्य निरोषं पिय बतक्पा, पृषाष्ा क्रे भूषा जो एरिोम !

गप्र पशि बह्‌,णो सहिप्मु हो निर्गसको बकरे पदान पेम मानव मान हो जिसके धिए जमिप्त समान

द्‌ षिता जगती के कषपो सेणाम परंन ष्‌ शू, णो सर्वश मीके सुले मे ठे छन्मस्त

एषि म्णा किख दुस्म जग ष्टा जो स्म करे निर्माण प्लवम्‌ मनुगतः का हो मिसये भिर बेत्माप ! पक्तरि मव मानयता का मिसे भिरित मभ्य स्वस्य रय मूदुम्दर भवसायर जो चिर ज्योति स्तुष

पौष गदि जो मिम प्रगति सं अने नहौ जद ब॑पन पाप

एते रपष्र्मो शे मामबताषा पूर्ण बिम! {प्रते

एष्व

क्प सत्य

भके श्प दौ भक्षा) प्राण} स्म ही मेरे उर मेँ सवर भाष बण जावा।

शपते श्य दी नषा

श्रीवम का निर प्म मेही दै सका मुके परिप

मुभे छात च्स्तु पुकारी म्म वीमे घे श्रोप]

सख है णौगन के भषत्ठ भं

र्वा 1 फ्तफार मणे पंषमम कणि कुषम का पर, एष्य भपार।

सषि दापि ौन्यर्य प्रेम नैर बयो का हार मूषे सूमराठा श्प प्य शपाम का सार!

युषे स्प ही माता

प्राण 1 षप क़ पस्य

स्प कै यीद्रर नही समाता!

भे क्प हौ मावा (१९१८)

बानर

हे प्रति

श्वौ मानब्र जग को महु मर्मोग्बल रस्साघ भौ हि ुमहारी पर करता सहूम भिलास ! भोम परषय जामा भे र्यो पए बिष्य करे पाष यैन शी छि णो छम धूमे माशाण। भापरवाए्‌ं अति मनि डी हई पूर्णं उम्मुक्य शु एतोग्रस तेग परा के जीगन के उपयुभ्व | रिजिग पीबन विकास एवा नमीन म्मा ष्वो फा हुखििंषरार हो उटा भ्योति भवदाव)

१५१०)

भेम जीभगेकादपिर पिराभो मे कर बहन पशय वृष छदं भग से मानष जगम तुमने मदा प्रणमय प्‌ घोमा पह एश्ठि दीप्वि मह यौषल क़ उदाम मवी मन मे भोग दुर्यो को गती प्रिय भभियम जमन की मक़ातामों का यहु खन्द ममैव मानम भौ उपमोग भर सके मुक्त, स्वस्य भानव!

चाणी

बाधो भाभौ

जोगन कौ बाणो दो मूुपरको मास्व मौन गमत कौ भेद

भो जि भाषौ र्मे उडुषः

जिस पीर चिरि घे निपतत

हठे मृश्ष्वि भिर्ध।

जिस बभौ मे मेष गरणे

बहरा एते सागर,

जिषे निह षाभिषौ षमकती

मोर पावे पुम्बर) बाणो भानो

मे ष्प्तु बी दौ पूं भिरधन। जि बाणी मे दू मखयानिक पर्श मरा वेन विषे मृदु मृष कुमुम बोण्टे भम्‌ अभू करै नरवन {

जिस भाभी भे दूषा वपा न्तो काम शष्ठ न्ये तन जिषे द्म सुच पुष उदे भटे पैम मौत

काजी माभी मूषे सूष्टि कौ बाणौ दो वगमिमप्भर। # 1;

षष्टं प्रप स्प

षणी

पूग भिरर

क्सि बाली भनुमब कणे शुके निचि चराचर]

1१८)

भो माणी जिर जन्म मसग,

तम शौ प्रकार से है पर,

णो बाणी ओवन की जीवम साए्मत, सुन्दर, शर 1 बाणी जागी मुस्फोशेपटषटकी बामी के प्मर।

दैमद

प्राम कवि

महां प्म भने मर्मर यहांमन मु बिह पंषन जीबन का प्ंगीय शन र्हा यहां भवृष्ठ इवय का रोदण

महां नही षयो कपी नायो षी प्रिमा भौनित मह प्ययं भिषषीठ मे पुष्या को कटा बिव

यहा षरा षा मूख कप है, शत्षिठ गष्टिवि जग कषा भीन एुम्बरवा का मूस्य षरं क्या जहां उर हो शुग्ब नगण छन?

पृतमबहरे क्निको चम तें युय का शङ्ी धत्य पिब धुन्धर, कृप कप च्टये वसे उरक श्यना भिमूषकिठ गीमा $ स्वर |

अरि हौ मे भूमा करता

बहु ष्यष्ी बांब का धारा काण्कु्नो की कतीपे षो

पया जषानी है मापय। विका शिव भर शर,

महाजनने म्याजष्ो कौढी एरी ष्मणो मेशुमठी षदं

शुक हूः गरब षौ मोगी]

उरी रसे धिषा कठि कव

पाष दुत वने देवी ब्‌, मर्थो नाजा ब्रती

उजद गर्‌ भो सूओ छी बे] बिादषा दर्प के गृहिती

स्वभ भली ते मती भष देख रेल के मिना पणमुद्य

षिविमा शे भिन बाद गप मर।

पर विपवा णौ पताह शषटमी भौ मधप पति बाठिन्‌ पकड मनाया कोवा ने श्म बुषएर्मे मदी एष्ट दिनि। कैर, पए शली पूतीः नोक एकग एूषरो बाती करय स्मृके दौ पूष कर्‌ सपि लोटय टवी छठी 1 पिष्टके धून ष्टो प्ति वार्थो पं प्रज नर एक चमक है शती रपट

भारत माता

पारव माता प्राम भासिनी) चो मे पला ब्य श्यामल शस्य परा जनमीगत जच प्रया पमुमा मे सभि भम गड श्लील मूषि बृञ्च तदाघिनी |

स्वन भौम अमु पद भव भतम मों पर देवे बुस के शन पम एप शा ष्ठी ठा मम स्बरभे कला मू पष प्रगाधिनी।

वी कोटि पु अर्भ भल भप कस्म पकिव अनपढ़ जत क़ दूय खर बर गप प्रणव घौ एस्ल निषासिनी |

फषाररो का खड मूस्य

पकक

स्व के श्ीर्यो घे मर भम भीरवघाि क्य धूम्यं मे भप्रचिहित जीवत छी वमिष्ठापा धै जटाबटाप्तिरि पए, पौवत कौ समश छटा अतन पए छोरी मरी जिया रग रम की मुरि प्रण ठन पए गृष्न करते तुम मटपट भर पदु पम यन्ठंसत जाभोदा ते घमुज्छ्गधित जम मने षा हिला बरातेछ 1

रदे अवप आनेष-पिवक्ष मुरां गमत

प्रलर साक्षा कौ ज्बाक्तामो सौ भंमुमि्पं फपिव अर्ण हे पुम प्रगाङ भीमसास्तास-से निर्भर बहमार खाम कामना केने भूपे मनोहर] एक दावम ताम्र डमङू बर, एक प्षिषा की कटि पर नृत्प दरणि प्रते पुम जव मत के पुलक)

{१९१६९}

बद्र

बोकर रग्मतभोपसे मामन स्वरसेक्पिते

भण पएशछाका माृ जितक्र हदय पटक परर्जभ्ति श्त पएरपसाए ण्या घुम मेरे मन र्मे क्भमए बन एषति का सिम्म स्यमेठ ौन्यमं स्वम पिका कर | मग पुम के एत्वामाौ ते भीरिव मेप न॑वर अन मागम यौरव पर बिस्मिव भागौ चिन्तन प्रर)

ष्ड निपाका प्रथम (9. बाहर दूर ्विसिय ठक बन्‌सोपा क्षममर्‌ तलका प्म हेता पूले भे चष बोरीमदरी भूषन से जर्क ^ दा ब्हदिकाहप ठे

ष्व दीची माम्‌ पुषः खे कंपि प्रन षो हरि गे णमे के पय बरौ जयत बुत्‌ की बूर दौ छायम्‌ षव इल्दताक षा माग द, दर्म स्फ पय जो अमद नेसे एम षौ पभ प्म ऊप पामपाम ष्ठो पेष्‌ के मने

मदिरे मूमपर मुनिर ६, पनाह

सरद पूषणम नालम पुष सैर पमल साप्य दनय अप्य पुर लयम उरग

हस्ता प्रत्यक कटिनि दृरिक्‌ का सिषा षूद बादर कहता हिमर्यक धा हिष्ना| ्योधि एनी स््र्यमा भम बीर ठरगिये परियो कौ मामा सरसी सी छयाश्ेकितवि स्वस्ि पू हारा भर्म से एषिमित सीषम कै नमं मे रलमन पृक सी निरिं {

ओज फां क्वौ रविं स्प्छपि सगन रदी को किष साकं मिस्मित से मतर्मे। परष्न भिदे जो भमापि तेम पर गढ उर मे स्षिह पुष की मोर किमे भिर ईपित पृष्ठ देहो संसृ का खस्य ण्यो जनिधिठ भ्या शह धुम धरय ? गहन षम भिससे ण्पोविव 1

्पोत्त्मा पे भिषसिद छाप्ष्छमू परब॑वर प्याभित श्यो लाक्य स्वप्न अपक नमर्नो पर। यह्‌ प्रतिषिष शा दुप्म महौ छप से बावापते शुक्त णया अप्यरि! के जम ने मोदत] शिर परि मापाज्डते बम पदु चपरि निक भस्ठर्भिक अगत कस्यना से ज्यो] िभिठ ! माम भसूरप्ता कुरपता जग छे भोल खम धु मुदष्ही युदर, उर्ण्व्र हौ उर्ण्बल|

एषृ प््िधि हूते पपे यह्‌ विकसित एरूण्पोनि कर यै धमस्त भु चतन गिभिष सच पह बालो पाठ वं दपे करएथट्‌

पाय जापि दारण षौ ओर्‌ चग अहर) अौदतर्‌

सस्कृति का प्रक्ष

रायमौनि शा प्रप्त सही रे भाज बमव के सम्मुष जपं छाम्य मी मिय गे घष्वा मानकजीवनके दश) श्रथ सकफ इतिहास निभ्पौ षा छाग मैषन्‌ बहौ नही युगा सदमी जीबन सुषा इन्दु जन मोहन | ओज भरत्‌ सास्छृतिक समस्या भम के निकट उपस्वित क़ मनुजा छोयूगं मूक हीना त्वभिमिष जिषिष भावि बमो पमो कोहोला षभ पमग्क्ि म्य पूर्मोकी वरिष्ठा को मागषा मे निकसित।

जग लीग के अन्तर्मुख निमरमो से स्वयं प्रमि मानष का सषणेठन मनहो गमा माज परि्तित माद्य भेतमाजों मरं उसके भोम ऋति चत्पीकन मिग सभ्यता शठस्य एनि सौ कर्णी पुम वर्तन | ब्पर्णं लाय रष्टरोका भिषजौ तोपा का गर्जन रोक सकते जीबन कौ बति प्रत भिमाप जापोयन | तषे प्ङापर्मेमस बर्यो का होया स्वं त्िमज्निति पतिश््यापु बिग पुरम की होली रैः परातिय (१९४ }

णणिचिर

रिम मन्‌ पर्‌ एिजय सके मन्‌ शन्रषो रो पष्‌ पमि पूर्ण षाण्ण पनूशदी एषु चेदम खु रकार युप के पुल चे कग मर का पत जति मह सत समय तते णव पु षे मु मानष संल हे जन सर्हूदय पदर, सुर कर्मं पर पदा हो रप्र से पष चे पस माज पालम मानम, हो काम)

हे बर्पम जनकौ जग सवते जीबन्‌ कापर,

हद मानदकोदो प्रु! मव मानदपार्का 1१ ५९५०)

सम्मोहन शादु शिछाण्यिशतपू पर) चुप्ने छोनेषकी किरणो कौ श्नीवन हरिममी भो गो कृर। पूता से र्रर रेमोषे निकर पूर्मं स्थ उर के भौठर बनते स्मणण मषुर सम्मोहन स्मरण शिरे ब॑वरबर्‌ षर्‌! स्पधि जाडं हृष्य कलकय मापा भनी रमो शौ मर्मर, एर उर पर देठी माब कमक मूरशो रे णौनिद-सेसर प्रणय श्ष्टि दी मुग्ध शूर्गोको प्राणो खं सगीद विपा भरर, स्मरण कामना का तव भूषट डल बराक मृड पर सुर) निम बौषन का ददु संप्पय भूक णया अव मानम्‌ मतर जम जीवम्‌ के लष प्वणनंकौ भ्पौति भृष्टि बमर स्नाने कर) स्मरणं जाश घूमने जौषन कपट हिमा हुश्य मे हृधरर, यर्म पौनि श्न घणा अभिर ल्‌ प्राणो तं स्वजिम निर्भर] स्वं बको बभ पार्ये स्यथ शठेन कै भिर सुतष्र स्वप्नो ओो युमगे जगन षै श््दे षौ मस्यं एोक हर! भट्शृतर (२९५५)

प्ौरोदभि वै

भ्योल्मा भे म्ण मौन

भप्यए षोक कमते मोहि) मस्पौ

भुरा प्रमाणो षी रमौ महर र्ती णौ म्मखि देवदराइ की आर सुषि चे मरक चदरहूट्पि तेर्माणित भौमे स्वगं मुल पर र्वि दुम पु धिम स्मिति से चिर पोर भारि तत्वे भपभी ही पौमा बि्ठोक र्ते भनिमेपिर्धे !

वरीी छप पी हन पर एमी भामा को-एौ सिनग ष्षतूप महण दीपित उक्ते ये पत हेसभुग हिमस्य स्थृठो के र्पर्मो पै म्म छित्‌ अरति हिप के रोमिरपन भो धै बेष्टिति रप्छेये चरमो हि मापो निरेजम!

प्रति शन्तः भ्रौ धी मपुत्वणु मधः स्प्ट देहौ के पुभूमिवे भीर रम्यो फो दृ म्यो पर तड दत रथिष। मूख्ती पसप की षभ श्चौ्म प्वार्णे घे षी शपति भेदे पैम को निव उनकी गौत बोर रणतो भूजित्र)

इष्यामी

मेभ की णया

इप्ति पाटिया बीं न॒ के भीठर उड़ता जि दिरकतियो का कूयुभित सगर उपणो पर

च्म उत्स क्रे प्रमो बै स्वर रज हिमानी पूरबों

मोम बिमा रिका्मो षा वह्‌ मौन इदप मं मब वष म॑म्ति नो के अर स्मो बे निर्भर शमस वेय कि मुमण्ि भीठं ठे तठ षम षा र्म मपे प्रणा मन मे भांदोषिव दर्ध्पं शी गुरी छपाए्‌ प्पोर्भिर्णिमों घे षीं गुष्ि।

मै उर में

हरते खर तृपार षे निमेन प्तीए्म की मुजिव भर्म स्रमीर्‌ उर बरवा

नमी पीलौ हरी

चोफार्मो षठा मम जमा

स्त॒ बुहागे र्मे माया प्रोर है बता

संभ पुरा वुम्हारौ शेषी किद्मर मिथू से हो कूज मया निमूव बहा उम स्थि सौरम सरे सवव उण्चषसिव कीपभिपां जक भक द्म कै स्प्न कसा करीं है दीपित भो्सो के बत मं म्क्ति स्वरे ह्यो के मुक्धारर स्मित !

म्ण दषम की शप्म भनि

चृ अम तक दन्‌ करती पुलति शती मपरमा कै चप चे अनमौ अगाक्‌ सौ परी भिस्त अग पी म्पा बहा रीरूतौ भू उमा के मूवसी षएर्मित बहती शप्र कलापौ रिति पी

टी निरि फे कोड

भव पौ भह बरु निभा पुप्प पते से पर दिये स्मि ्भशोदामं भरा षडुदही पापान पिल्‌ पृक पक्छमिठे। लवे भी परिम पौरा शा पषण जर्मन कएठे चम पिक मूलणिदि शेषवार कै स्यं सिक्वर ठि ही कटे स्माभि स्वि) ष्दौठमी

भनीमूत अष्याद्म वत्वसे जिससे ग्योति षष्ठि षव निरृत भ्ण शी ईपिपाली से स्मित पूृथ्बी तुमये मर्हिना म॑भ्ि स्फटिक सौषन्धे भी धोमा ने परिम रे ग्गो से कशिपतं स्वनं धुम दष षमुभा पर्‌, पुष्य छीर्षं है, देष प्रधिप्वि| (१९५६)

पिवाभरी

छमोति भारत

ष्योरि मूभि

जन मारत दे ण्पोवि चरण धर जहौ सम्यत

जवै वैयोस्मेष !

एमाभिस्व रौम्दपं हिमा श्वेव षाषि भप्मानुमूकि क्य पगा यमुना बरु भ्योतिर्मय ष्वा जह्‌! भ्पेय।

षे हा ज्योति के भिर्भर

षाण प्रक्ि मीठा रषौ स्त्म,

पूर्णं काम जि शह एथ पर्‌

फोर टद रोके | <

ष्क स्नव मूच्छ षणी परर अरा अमृत ज्योति स्मधथिम कर, ष्य चेला का व्क मर शो भम षो रेष!

(१९४६)

भटूरा

एय पर

मब पक्तवा

भार षा धय जसता

पष्ठा &।

मेष मन छन बम जाता है,

तते भरा मन ङि क्ट क्र

षर

षन श्न उपर

५1 पावा दै]

मण मनेन षन जादा &।

चग कै मन्‌ कै भगण तयत हु, जीवन सव॑ष महन शृण प्हषाने कख पपन जो मुप दुय क़ सबल्न ह! क्व यहु उड जम मध्य जाता जीवने की रज न्पिटा शता पिर मेरे चतना मयय में द॑पनुय पन मुमराना' मेही जातवा षव कमे फिर पह प्रण रिप्णे बगमाता। बार भीतर उपर मीभे मण मम जाता भाता है मब प्ति नना जता 81

धरन के ममे बी भनभ्ति माग्या षे मन जिर ज्योनिन मबासी २-९

षतु छामा

ष्या शे जो

भिज दामाद रेता जीजित

ष्‌

प्रदम मु

श्रमे मे क्या सिद्धलाठा है| भया है हेय) षौ ता है! मन भौर बार जटा ६ै।

(१९५५)

11

मन॒ जहा मत मै तन मे रन चत्ता दै, जेते जगचेतम नित गष परसिमवैन इश्ता &।

मन॒ भका दहै)

परबिता

षो परि मातवा षाहसष्र, मिता रम्ब भ्पोम पृष्ठ पर, मभ्य रप्रयो घै ग्पोतिमय भतरि्त को जामोक्सि षर | श्षप्ठ भए्व से सप्त एोक कर पा बेग में दिभ्य ठेन भर बह मदेन भारा पिया निज भिर्णो से जिमुबन रा तम॒ हर!

उन्होने सो श्रि

समिता ष॒ णो प्योरि्मप पूषन

भ॑पषार्‌

हट भया प्राणमय

भष बौगम हा रा ग्माहित षह महेह भा ठा रम्यो

मामू

शाण घे भृत!

म्ंषरि पर पन्ने

बाते

माज पा £ ममिनब षय

लम प्राय भा मूर्यं

उह

भिक मया दमवरता मप्त मब र्प।

श्यगं भोर नित पाषमान अम शस्य हम शै रंग म्पोनिमय पे हए ष्ट्य सिना धदृना ही यता बह निमर हयामये

(१९४५)

घ्व मूको ढो देशा हमा, देवों को ले इर्य मे स्फ ष्पाष्ठ घ्व लोको बहू पके बपार पलो ये पिधिपढ ¡ हार हाच बह स्बर्भ पस्य बह ण्योषि पर्प जजर अमर्‌, प्रे प्प्ठत भार घने के श्वे मातरि से भिक्तर।

१५)

सामजत्य

भाग पस्य शोषी मुशे मदमा पम~त शौ पमा है बत्पन मूसे पूषा बरना कम में भिक पाता जौ उपमापन। पाडिकि कीर्णं हिवप है मोस पोत ही इनका चीन शषौ रेव्ये एकु बरा है एक प्रयत ६, एक पमौ जन।

बाङौ बत्तु सत्य मुह्‌

दिषना

मुषे महीं भा यह्‌ द्यत मिप्र देह है अहौ भिप्र रचि निप्र स्वाय {भप्त सवके म) भौ एकम भरे षमी पूण षक पपत मे नायै कर स्वही डोर मूलं च्वुर है शोष पनी कुरिषठठ मौ भूुन्धर।

मागम पष्य मपे शा पै शनो शेनां ना पण डान मरत्प न्‌ डद सामरस्यं ने

बोली मुषा कण दोषो कमा बार्न को मही भूष्वौ भौ संबाममे। सपने उङ् गे पाठा भित णिक षप यश्वि दोनो मे

रहौ यै क्या चण पक्ता लभ

भोगानदे

(१९४६)

लामा

(१९५)

वैंमर

रा

वुनिमा

के पकं पप्य मे

हश ब्द को धक आाङाद कहां तक दण

यँ पादेव बां तक!

ले रो! भोके रूण एब

जच्तम

मेसा ।,॥

पैर उलो समर) ष्म मुरीढ सामने हो मया एकर परैर षर)

ठीक इ्रूषय पैर चरमो ष्कते बेर भवौ फिर पुर कार बार यिर्‌, कहू श्िप्प नै यहे तो नामुमकिन & हजरत! षो माञ्ाव यौ छक कवा गरुम एक वैर चठ ज्यर भेण हए दएनिमा पे ष्या वर बरूषण अद्र कमी पर वैगेबर शा वा यह उत्तरा

प्वपन-बंपन

शष स्तिया तुमने प्ररघो कोपो केगषनमे एक मुर जीगित मामा सी क्षिपट पर्ईतुम ममम) बि लिया तुमने मुप स्वप्नो मे मासिगन म! छन मौ भामाएे घम्म पवी फिग्ती लमती मौमौरतगोभरे माषो मुहु भस्मना रेणपी मानमि तुममौ शारएक़ही शमे मनर्मे जगी !

शु स्मरण कर जी उठते यदि स्वप्न भाकउरम णनि ८) भार्यं प्राप शन आए गान} हदय प्रणयी क्बि। धुम्हुं देस कर म्निष्प णांटनो मी जो बरमाभे रि वम एौरम सी सहूज मपुर बरबस पस जती मन में पप्र में साती बगन्न रम साठ भिर जीबन में तुम प्राणों प्रमय गील बल जाती उर कपमम।

धूम ष्हीष्टो? दीपद सो मी दुबरी दनक पएवीमी मौन मभूरिमा मरी लाजहो मी मागार मजी धम भारी फो? स्वप्म कल्पना मी गृगुमार सजोमी पुमे छेन पोमा ही म्यां ररी मी उट माई भम भगिमा तनिमा बन मृदु रहौ बीष ममा मखा भोम मंभां पषटिपि तन पर पाई!

षू नित उठ दुनर्बमीष्टीमूषोदी (नाः

मूग्द्ा बमुपा परनि मीमौरगापं एः

छाया ग्पोष्ना मदूषी प्रनि्वि सी उवाय 1 सताने

(१९५)

धुम र्मे जो छाबभ्य मधुरिमा णो जघीम प्म्मोहुन पुम पर प्रान मिह्मबर करने पायक षो एठा मन गे बागती क्या तुम निय निज जपार भाकर्बण | अभ क्या तुमने प्राभों को परमय स्वप्न बन्बतर्ये गुम भानो ममा तुमको भाया ममं छिपा क्यामनर्मे] सपभनुप भन कर हती धुम अम्‌ माप्य के षन |

12

स्वह कशा क्पक्े ष्प्ममे प्रमेमषे।

एवो-युग

णाह पुम शधदनी शासा मिर्षर भरौ बुभ बति हो ण्डा जन परणी पर! पि पू्ो के दोर गुब भनार णर ष्षप्रगय घछोमा रेलाभों का जाद भर!

वीय पा णाम ख्यो रष्टरषका मरण भमाए-मी भाय चल रही भू पर भेतन-- भमनम जय दीप धिताके पम धर बुधन भी के ममे स्क षरा पर्‌ कते भिचरण |

पप्य महिषा बत भम्तरष्टरीय जागरण

(९८)

मामभीम स्प्यो भरते धरती के प्रम! भुका चदि भमु के अर्मोषो धर मारोहन मभ मानवता करती गांभी का जय पोप! मानष भम्वरठम शुर घुपार के पितर मभ्य जेना मंष्ति स्मभिम ठे मब निपर।

निप्रान

मएत गीत

णय जन भरव म्‌ मव जभिमव जेन बन तष निषावा! सौरव माफ हिमालय रण्ण्षले

हष्य भमाजल कटि बिन्ध्याच्सत स्त्म चरण तल मिम ध्राप्मत प्रचा

हरे शेव हरे नष निर्ग जीयत घोमा ज्र,

भिस्व कर्म एत कोटि भह कर अमणि पद पब पव पर}

प्रम सम्मा भाला साम प्मित युपर पाना

अप पव माषदता निर्मावा

सत्प बहिषा दाता जय है जयहे जप है, पान्ति बभिष्ठाता) प्रपा धूर्व 1 61 च्टे

पटह धुमुण परब चठ, जिपाल स्य षम्य शह भूय ष्टे) किति स्वरूपिभि बहु बस वारिधि दित मारत पाता धर्म चक रथितं चिर्य स्वज जपपमित फटुराता। हे जय हे यय ङे जमये भजय भावा (१०५१)

(१९४९)

मै सीव भिण निज मरस्य परीडुसे कर \], शठेन मनन मम कै पट कैरवा गै मपनै भैतर शा प्रका बसा जीवन फे दम को स्वधिम कर शरणणता। धै स्जर्दर्तो को बौ मनोमार्गों र्म जल जीषने षा नित उषो जण बषाता सानम परमो तवे मू स्वे बता कर जन भरली पर देषो का भिभष श्टाता)

भै न्म मरण के दयौ से बाहर कर सानम शो र्टका जनख्ठगं भवा भै शिम्बि चेठना का प्रेष पुषता स्वाधीन भूमि का स्मर्भं बामण प्र्ा।

मानमा भेष पष मनूभवा रेची भम भीभं जम मे ज्म + पर्वत षर्‌ + णी भिषन्‌ प्रपात भ्यो दर|

षू पू षर्‌ 1

एङ द्रौ

व्र श्ठिङर भिरवन्‌ षे लिकर मह बिष चरन रे नूवग।

वज रहै भियो पे वेव्व छमि श्थार पस्समिते जा जीबन

शम्‌ भ्योहि च्ल अर रहा सूजन फिर पुष्प बृष्टि करते पुरभन)

अग प्यर्ण ग्रबित रे अत्तम्‌ क्षरते मीरब मा रिर्षेर

अषतप्वि हो रौ पूर्मं पमि फिर मौन गूजस्ि उर भंबर।

केषता प्रसि एम बाहों सुर मामेव ठन कपौ पाए ष्रि कोष भतना रगमूमि भू स्वरम कर रहं परिस्मम? (१५४९)

एक्सौषार

पुग-दान पौगन बशो बाप णदू षन्दपं॑बुम्हाा नित बृहन प्न मे यै मर षकं अमर संगीत कुष्ट मुर मारन।

खान दुम्हारा बरख स्के षर प्यषा कहत उरे मीर, जय जीवन का इन षडे वंग देवत्व दुम्हारा होकर! षर्पा पाण से मानब षा भू निर्मम मतर षे उबर, पुष कमं णण जीबन के पमो सपि शौ चठ मपर]

जह मनुष्यत्व मे ममोमुष्न देष््व रा रे एनैः निर, भूमन षोपत्‌ स्पृहा स्व फिर गिषभरम षेषठो भूष्र! पह पषार शा चोर प्रहर

एव चदा एषित शिरि भागबीर इन माय

मूत पतला अमिरापरिह)

पयो डे मिर प्र पूष मृहूट

ज्यो पंप पनर यं भावन पौन मे मन्‌ ठि फ़ट्‌

ममद्थो मोमा चे भेदन] [व्‌ एष्पौर्वाषर

(१९५९)

ममम भमन धुं कूरा मन! है जम के दीव के नौतन प्रीपिनमौत प्रवि उर सप्त मं स्मर चुम्डं क्वा मत

म्‌ सजल ज्ज मेरा जनिन वुकि तरफ बार्वि के लोभं मह मानस स्बिि स्मृति छै पान्‌

कण्वा चुम खर्म्पग {

तुम संतर के पब से नाभो

भिर भडा के रज से] भागो

जौषेन सदोश्य सेग लायो

शवे प्रमात मूग वृत बहे श्चि वरि पाष स्बप्म पलः णोचत जपणक सै दै मी प्रोमा शा जानक जीवेन के पण प्रतिसम।

जां भ्यक्ति के रतये मौवर निद्धि चिष्म मे बिचरो बाहर, कम अजन ममणनि के उठकर

बत यु मापण,

मप हो जष भाव मगोनस

भगिर्णौ छे भवर बहकर

गरुम क्स्या-कर से यग्म्बस जषता कट दो जेतन।

(९

जिज्ञासा

भरा तग

कौन सोत ये।

दै दिन अकाणों मं लोप

कनि क्षमि

पौन

आगार प्विलसो से घण र्या खम प्रेण र्मे

सीकिमा्मो भे बहते

क्रिमि पुष प्या मे स्थमिम ष्कों मं क्त र्ह्ने |

मौ परा

पणि लान्दि

चुभ्र

31 शोत धै स्पा मे बुर्तो पर शिले मायो बः मतरेगण स्बपत्पल प्रनोररए्ि पर शिम्बि रकन पीन मित भीष प्यामि इला मामदीन गौर्मे म॑ मग्ग हा उटला उस्टूबमित्त हिगजम सग॒ मुगष्ण मे हय होना तष्रीन कपय मंनम्मर।

ण्णात्‌ प1 हिप्यब ष्यक मेम जाद उर मण्मी यें

मुनहनभै प्रीवा योद!

एष्मौगात

सोमा की स्वमिक्‌ ख़ान भर णाता सहसा मपरुक मन बयते मब चरो के नूपुर अलिज्िठ गीर्तो के प्रियं पद बग बह जते धीमार्ज के तट हणो के स्वा मँ मभि कहा उट्ता भल नीड से लाम स्प के उयर पास्वत| कौल श्रो ये (१९५६)

पति मोर रंति <

पनि नादि संति] स्यं जबष्म बहिपु पानेषे छो, भानस बह महद्‌ प्रकाप चाष अग्पा बहु हौ मप, रस्म भागास बनाहिप्‌ ष्टी भौ षह -भाय मूस्यतः देही बहे, कण मलाक्रिसामी - भरमा बनना है कर उतेषो।

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ए्र्भौनौ

एष्मौदनः

मूगेष जतको लोक नियति को पीन मनको। मी सिपि दे उच्च जागभत स्मिति एम्प्रि शम रा एष पणिकर्दन का शष ककृष्ट्ति) ओय भोर भरम कोलादृल के मीर भीय भूषठा स्वर एस्व हीत कपी मतंगरित-- मने के शबरो जो पूगा करता जनिरत! एष मभू उदूगन के निवाय के दस्ययुगमें सूजण भिरं है सूभ्म पष्महर अमर एष्िपां मानष के वैरम मे-जिनष्ा स्तौ भा सर्शप वैमम मतिभ्रमो कर पृपके पार्षदो अक्षित घोमा भुषनां मु पस्लषिव हे णा मानस की भपलक गलो के पम्मुक प्रतिभ) मूषम सृजतं चल रहा तापर के स्वम भरण पर।

षि कपर कस्पता पहौ--ममुमूव सत्य पहु चोः श्रातिर्यो के युग का नि््रात सत्य यह, मारोह कर रही मनुग चेतना निरेतर पिके ठे मब प्विन्ते पर जब उत्वी रिपौ भपर्पण कर्ती करादृतौ -जिर जपपजित ! षएसीधठिए, # परि चअर्धि-संहार सूजनेको जिय पराजय प्रेम भूभा उत्वान पतनम का मापा कुठ को युग के मुल्दर बुस्प को षहो मे माय छमेरे उं पर्व पूरणे पक जभिप्र मान कट-युग बिव दे अणे कििदर्यो यै प्पामादस्वित कर जिम्मव क्या वशि बदल रषा आधिक घामाजिक माजिष् मैयद्धिर मानय) यदि मनुज बेन

जद सामृहिष् अग हौ बन णौ बाहषः, दियर णू यदि भिगत पूर्णो के मन भुगटम?- कया मापचर्य बद्ता पदि भामूल मनुज णण स्वयं मुरगो षा मानं दिबर बदल एटा भद विर्पेलमे रपरषलम तष्चह्न के जगं परिवतिव हा रहै गए मूरस्यो ब्रं विषति) उन पर्‌ मधित निरि साम्कतिकपम्बपोना पाह हा रदा माग -माबेर्नं पिपर मे पूम पून यो एयोज्हिषो षै पणा पर! ज्गिल निपेषा स्वि अर्गनागों भो तमा फिक्र भिप्र बर अने प्ररपेकर प्रया म~ दिम्यृण कूर जीन्‌ पय निमुन प्रार्णो षा एप, मैनिकः भाष्यानि अवीत समरमन एर एा- निर छै मदपं लोर, मौय तष्य नष) भाय लदान ईष्वर भषनण्ति है णा स्बर्ण रिपयो सम्मित दतार्जो ढे रपप ति स्फरिषि एनिषाओं शि पर्वेव मा भगगिमि मुर भीभात्रो दैः प्त निप्र मा उण्मद भा मे पुजितं नष बुषूपाष्र मा

म्मे पन मीदषाए भा बार रत पमन्नर

भूपे ग्ट "कीतरने मपुषका म्बगिर पाष

भमा & गापननयं नगर म॒ प्रण षर

मागदमन हो यपिर पूपं पुरा बरिमुग।

जवना नेः षर पदु (पो मब मानदो

भषषदिपि बट विषमित एत्व अनि एनय जदा

वदद षठा जद मानव रसग्वर ददे ण्या मद

मोम अन्‌, भज्दलः स्द्रन्र्‌ भर1

(१९५१) एश मीप्दारट

यह परती कितना देती ह्‌

शने ट्पन मे ्िमकर वैसे भोए बे श्रो षा र्घा के प्यारे पे भेये स्पयों कौ करार मनुर परे धणक्ी मौर, पू फक कर, मोटा सेठ भरनूंना। पर, अजर रतौ मेँ एक पम भ॑कुए् ष्टा ज॑प्या म्र नेष एकु भौ वैषा रगण्ण- पनेन कृडा भिदि, कम भक हो पपु] हृताप्र हो बाट णोह्टा ष्ट्य शिनं वक जाक कस्पना के नपहक पदे जिहा एर शै भबोष नभा तति प्ररत बौजशोएु भे ममता को रोपा भा तष्ला को पीषा षा।

भर्वप्र्रौ हदरातौ निष्क ग्र है तम से

करिलने हो मधु पत्तर बीत पए जगेबाने

परैप्म वपे वर्षा पूली पर्दे मूसा,

भीष्ठौ कर हैमंत शपे तड प्रे, जिते बन)

शौ जत्र किर से बाद़ी उदौ डारुषा लिय

भरे शजरारे भदक भरते रतौ पर,

धने कतृ गप वपम के भते की

मीमी वई षो पौड़ी तरी लएशाकर

भी एम दबा दिए म्हि ढे तीचे।-

मू के मचल गे मपि मार्भिक भौंषद्एिष्)

रै पि भूम णया इव ्ठोटी क्षी षटना को

भौरषतभीक्वाबौ बाद जिते रलता मन्‌ |

कु, एकं दि जबदैषप्याषोरबापम मे

एकश षार्‌

स्ह णौ पा-ड सहमाधैनि णो देषा उमभे र्म भिम हो उद्य वै दिष्मय पे

देया मापन कै कोने मे द्‌ नषागत्र षो छग छवा शाने षै हए ह! ठा बहु दि दिजय-पताफपुं जीदनं षी पा हषयिपां गेोक्ते पबे कन्ौ प्वारी- जो भीषा, बे रे हरेपष्छाप से भरे पीप मार कर्‌ उष्ने षो उल्मुक एवे ये- छिम्ब होढ कर निरते बियो हेः बण्वोते। लिमिमिषे सप पए £ उमष्मै एठा रेदना- महमा पृक्षे प्मर्प हो भाया--भ दिन पहि बीम चेम के रो ये पैन भागन भै भौर रम्ही मे शौने पौषो भणै यह्‌ षक्टन मरी भर्गो कै सम्मुण भब पदी गर्द मर्ह बटे प॑र पटक युतौ यातौ दै।

तष उनश्नो देष्ण्रा ा--पौरे पीरे मनगिमेत्रौ परती भे शद भर प्राप, हरे भरे रेप तए भरर मयमनी शरोदे। वेषे पै पट्‌ इमः सा मनन परं पहए- भीर बहाप रेक दा धौ री का हो हो प्रौ पण षट षै उर षै बादर षह पपा दन कमे भृता टै! वार्यम एषे, शृण के पएरे र्यो किः सहरी प्यामल शते पट भृष लयते पे पाग के हसमुग भेम मे चोन के पोती अवन ठे दा ते]

एग्दौदैष

जोह समय पर उन्म ध्विनी पषा दूरौ ! मितिनी घारी फलिम कितनी प्यार एशां पतली चौद एडियां एष, उनकी श्या गिनती | लम्बी णम्बौ भगु्पी-सी वनी नन्ही वष्मबार्तेसौी पपे के प्यारे हर्फे-पौ घूठन षम भय-कसाजो-पौ नित ब्व श्वे मोती शौ षगिपसौ देर ङदैर लिलि भूर भंड धिक्मि दर शषपथिमा तारो-पौ | मा, ष्यनौ फां दृटी नर्डीभर लां सुबह छाम बे भर पर पर्णी प्डोखपाष के जनि अनजाने छव खोपों बेट्माई, अस्थु बावर्यो भिभो बभ्यागव मनर ते णी भर भर विन प्व मृहक्के मर मे बाई क्रिठनी सारी एष्या भविनी प्यारौ एमं |

मह बरती ठता क्ती है| भरतौ माता किद्रहः देती है मपने प्यारे पुषा को। शषौ पम पापा पा मै रण्के महत्व को- केष मं किः स्वर्णं लोम बदा 48 बोकर प्न प्रमितौ है भमुषा भव घमल पका हु)

एक सौ चौद

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अलुक्रमणिका

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पृष्ठ नि्ठा का प्रणम प्रहृष सिदृकौ ति बाहर प्लबरके एकप्विप्पने

भाप लिया तुमने प्राणो को कूलो के बन्धने भारत माषा प्राम भासिनी |

भाव सत्प बोली मुल मटका

मनं जता,

माँमेरेजीबसकीषहिर

भाम्॑स्मू केर्ल है,

भिषटरी का पह मेपकार

मुषेश्पहीमभरादा

भेरेगतभं (टीकेषरहैपेरभ्र)

यै गम्‌ मानयता का पन्देष सुनाता

शनि पूटपनमे किकरवैयेबोएने

सह्‌ पत्छववमत्रमर्मर

सजनीति भन प्रस्म नही भाज जभ्र पम्मुल र्वष्नकेचीौतसे भर्ग बीरग्या-से

शोभा हय मारकर माब

भो सरजित्ा आता पहर,

षो मागप्ररोर्श्‌टेखषकर्‌

अह जनित संयीठ कीनो भिमपे जग-गीदन्‌ संष्य बन्दै मातरम्‌

वापी भानौ जीवन कौ भासी टो मुषौ मास्मर) निशान जान बहु जुफय मूलम भहु मौलि पमं निहै भमनाम्ड्‌षरदाम

६३

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धान्त त्ग्प स्योना उग्ख्बम ! ४०५ गाण्ठि जाहिर पर॑वि ! रजते भगद्म भाहि १०९ स्वष्प भ्पोष्मु मे जड भमार्‌ २२ सग भर मर्‌ मए रेषमके-मेस्वरमर ५९ भूरपि के हेम ही मनूचर १७ «~ भम्र बिहु भूमन मुन्दर्‌, 11

पि! मुरयुशा पैसा ममर, सपार्सिष पूजन, ५१